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प्रकाशक के डेस्क से

हम वो हैं जिनसे हम मिलते हैं

हम जिस संगत में रहते हैं उसका प्रभाव हमारे दृष्टिकोण , भाषा एवं कार्यों पर उतनी ही गहराई से पड़ता है जितना कि हम जो भोजन करते हैं उसका पड़ता है.

October/November/December, 2010



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हम सभी इस वाक्यांश से परिचित हैं - " हम वो हैं जो हम खाते हैं". इस विषय पर हिन्दू दृष्टिकोण यह है कि जो विभिन्न किस्म का भोजन हम करते हैं उसका हमारे मन और भावनाओं की अवस्था पर एक महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है. उदाहारण के लिए, मांस खाने से, जिसे कि तामसिक भोजन मन जाता है , निम्न स्तर की चेतना के कपाट खुल जाते हैं एवं डर, क्रोध , ईर्षा एवं इसके प्रभाव से पैदा होने वाली ग्लानिपूर्ण भावनाओं से दूर रहने में मुश्किल होती है. बहुत अधिक मसालेदार एवं उत्तेजक भोजन खाने से या फिर राजसिक भोजन खाने से हमारी शारीरिक एवं बौधिक गतिविधियाँ अत्यधिक उत्तेजनापूर्ण हो सकती हैं. इसके विपरीत शुद्ध या सात्त्विक खाद्य पदार्थों - जैसे कि ताज़े फल एवं सब्जियां जो कि ज़मीन के ऊपर पैदा होती हैं हमारे अंतर्मन एवं आत्मिक स्वरुप को पुष्ट करते हैं. अधिकतम अध्यात्मिक प्रगति के लिए , सर्वोत्तम होगा यदि खूब सारा सात्त्विक खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाये, राजसिक खाद्य पदार्थों को कम मात्र में उपभोग हो एवं तामसिक खाद्य पदार्थों से बचा जाये. छ्न्दयोग उपनिषद् [७.२६.२] सिखाता है - " जब भोजन शुद्ध होता है , मन शुद्ध हो जाता है. जब मन शुद्ध हो जाता है समृति पक्की हो जाती है. और जब व्यक्ति कि समृति पक्की होती है , वे सारे बंधन जो उसे दुनियां से बांधे होते हैं छूट जाते हैं."

आज मैं इस विचार को आगे बढ़ाना चाहता हूँ कि " हम वो हैं जो हम खाते हैं ", इस तरफ इशारा करके कि हम जिनके साथ रहते हैं वे हमारे मन एवं भावनाओं क़ी अवस्था पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं, इसीलिए शीर्षक दिया गया- "हम वो हैं जिनसे हम मिलते हैं". नैतिक शास्त्र तिरुकुरल के ४६ वें अध्याय , " कुसंग से दूर रहें " में दस मायने पूर्ण छंद हैं जिनमें यह वर्णन किया गया है कि जिस संगत में हम रहते हैं उसका हम पर कितने प्रभावशाली रूप से असर पड़ता है. प्रस्तुत हैं इसीके दो छंद. " जैसे पानी जिस मिटटी में वो बहता है उसके अनुसार बदलता है , इसी प्रकार व्यक्ति अपने मिलने वालों के चरित्र को आत्मसात करता है." " यहाँ तक कि उत्तम पुरुष जो मन की पूरी अच्छाई रखता है वैह भी पवित्र संग से और मजबूत होता है."

हमारे कार्य, बोल चाल, चेतना का स्तर एवं जीवन के प्रति दृष्टिकोण इन सब पर हमारे साथियों का जोरदार प्रभाव पड़ता है, ठीक वैसे ही जैसे हमारे खाने का हमपे प्रभाव पड़ता है. इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि हम अपने आसपास अच्छे , धार्मिक , उच्च चेतना से युक्त लोगों को रखें. हर कुछ माह में मुझे किसी से ईमेल मिलते हैं जिसमें यह कहा जाता है कि वेह पुरुष या महिला नियमित रूप से साधना किया करते थे लेकिन कुछ समय से उसे बंद कर दिया है और अब दोबारा से शुरू करना चाहते हैं. जो सलाह में उन्हें देता हूँ उसमे हमेशा यह शामिल होता है कि वे ऐसे लोगों के साथ साप्ताहिक सत्संग किया करें जो स्वयं साधना करते हैं. साधना करना मुश्किल हो जाता है अगर आप इसकी कोशिश अकेले करेंगे. हमें इस मार्ग पर चलने वाले अन्य साथियों का साथ चाहिए होता है जिससे कि हमारी साधना शक्तिशाली होती है, विशेष तौर पर जब हम जिंदगी के मुश्किल दौर से गुज़र रहे हों. जैसा कि मेरे गुरुदेवा , सतगुरु सिवाय सुब्रमुनियस्वामी अक्सर कहा करते थे : " समूह व्यक्ति की एवं व्यक्ति समूह की सहायता करते हैं."

निश्चित रूप से हमें बुद्धिमानी से चुनाव करना चाहिए क्योंकि साथियों का हम पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है. इसको समझाने के लिए एक कहानी प्रस्तुत है. एक युवा लड़के नें हाई स्कूल में पहले साल की शुरुआत नए दोस्त बना के की जिन्हें गालियाँ देने के आदत थी. लड़का पहले कभी गालियाँ नहीं देता था पर अब चूँकि नए दोस्तों के साथ काफी महत्वपूर्ण समय बिताता था , उसने उनकी भद्दी भाषा को अपना लिया.

जिंदगी का एक समय जब धार्मिक साथियों का होना बेहद महत्वपूर्ण होता है जब वे युनिवेर्सिटी में सालों बिताते हैं , विशेष तौर पे वे विद्यार्थी जो अपने घर से दूर रहते हैं. सबसे स्पष्ट नकारात्मक प्रभाव उन विद्यार्थी साथियों का पड़ता है जो कि पढने से अधिक पार्टियों में शामिल होना चाहते हैं. इससे कम नज़र आने वाला किन्तु उतना ही नुकसान पहुचने वाला प्रभाव पड़ता है उन पढ़ाने वाले लोगों से जो धर्म के खिलाफ हों एवं नास्तिकता एवं सांसारिक जीवन का गुणगान करते हुए हिंदुइस्म को खुले तौर पर अपमानित करते हैं. ऐसी मुलाकातों से नकारात्मक आदतों को पैदा होने में मदद मिलती है एवं विश्वास को धक्का लगता है.

उपयुक्त धार्मिक साहचर्य की प्राप्ति कैसे हो ? युनिवेर्सितियाँ ऐसे ज़रूरी नहीं है की सत्संग समूहों के पास हों जिनमें वे आसानी से शामिल हो सकें. जिन विद्यार्थियों की युनिवेर्सिटी किसी मंदिर के पास हो , हम उन्हें यह सुझाव देंगे कि वे सप्ताह में एक बार वहां जाएँ. अगर मंदिर इतना दूर है कि सप्ताह भर में जाना संभव नहीं , तो कम से कम कोशिश कि जानी चाहिए कि प्रमुख त्योहारों के समय उनमें शामिल हों. एक हिन्दू युवा विद्यार्थी ग्रुप में शामिल होने से विद्यार्थियों को आध्यात्मिक दिलचस्पी रखने वाले अपने साथियों से बात चीत करने का अवसर प्राप्त होगा. अगर आपके स्कूल में नहीं हैं पर युनिवेर्सिटी में हिन्दू विद्यार्थियों की अच्छी संख्या है तो इस बात के विषय में सोचा जा सकता है कि एक जाने माने हिन्दू विद्यार्थी ग्रुप की शाखा आप के केम्पस में खोल दी जाये. कुछ अन्य संभावनाएं होंगी कि किसी भारतीय सांस्कृतिक ग्रुप में शामिल हों , या फिर किसी योग कक्षा या ध्यान कार्यक्रम में.

अपनी आभा कि पुनर्स्थापना : चाहे हमारी पवित्र साथियों के साथ रहने के इरादे कितने भी अच्छे क्यों ना हों , कभी कभी हमें पुरजोर भौतिकवादी एवं सुखवादी लोगों के साथ लम्बी बात चीत करनी पड सकती है. यहाँ चुनौती यह होगी के इसे इस तरह किया जाये कि उनकी भावनाएं हमारे को भीतर तक जा के हमारी भावनाओं को ना प्रभावित कर सकें. अगर ऐसा हो गया तो आप उनके मूड एवं भावनाओं को अनुभव करेंगे एवं उन्हें अपना ही समझेंगे.

अगर आप उन सूक्ष्म उर्जाओं को देख पाएंगे तो आप को पता चलेगा कि आपनें दुसरे व्यक्ति कि आभा से अपनी आभा में गहरे लाल , धूलनुमा भूरा एवं हरे रंगों को आत्मसात कर लिया है. आपमें इतनी प्राण शक्ति नहीं थी कि अपने पे हुए आभा के घुसपैठ से दूर रह पायें. दूसरों कि आभा से आये इस प्रकार के अवांछनीय विचार एवं रंगों को अक्सर मानसिक प्रभाव कहा जाता है.

आभा एक चमकदार , रंगों से भरी सूक्ष्म उर्जा है जो मानव शरीर के अन्दर एवं उसके बहार चमकती है. आभा का रंग आपके भीतर कि चेतना के उतर चढाव एवं चेतना कि अवस्था के हिसाब से एवं विचारों, मूड एवं भावनाओं के हिसाब से बराबर परिवर्तित होता रहता है. सौभाग्य से ऐसी योगिक प्रकिर्याएं हैं जिनके प्रयोग से आप अपनी आभा को जानदार बना सकते हैं.

मेरे गुरु द्वारा बताई गयी एक ऐसे हे प्रक्रिया पेश है - " चुप चाप बैठो, गहरी सांस लो एवं मानसिक रूप से अपने प्राणिक शरीर से संपर्क साधो , पहले उसके बारे में सोच कर और फिर उसे महसूस करके. ज्यादातर लोगों में प्राणिक शरीर एक या दो इंच शारीरक शरीर से बहार निकला हुआ होता है, यह उनके भीतर कि जीवन शक्ति पर निर्भर करता है. बेशक प्राणिक शरीर पूरे शारीरिक शरीर पर भी फैला होता है. जैसे ही आप चुप चाप बैठते हैं, धीरे से गहरी सांस लेते हैं , अपने अन्दर की जीवन शक्ति, प्राण के बारे में करीबी रूप से सजग हों जो आपके सारे शरीर में बह रहा है. उसके भीतर की चुम्बकीय उर्जा को महसूस करें. उसके जीवन को महसूस करें. इसके बाद जब आप सांस को बाहर निकालें, मानसिक रूप से और भावनात्मक रूप से इस जीवन शक्ति, इस प्राण को अपनी आभा की तरफ भेजें. बाहर निकलने वाली सांस के द्वारा इसे शरीर के बाहर के आवरण की आभा जो सर से पैर तक है उसे भेजें. मनुष्य के बाहरी सतह की आभा भौतिक शरीर से तीन से चार फुट की दूरी तक होती है. जब आपने इस तरह से अपनी आभा को जीवन शक्ति प्राण से लगभग नौ बार [नों सांसों से] चार्ज कर लिया हो , आपको ऐसे महसूस होगा की आपकी आभा की बाहरी सतह पर एक चुम्बकीय कवच पैदा हो गया है. आप बहुत सुरक्षित एवं संतुष्ट महसूस करेंगे जब आप अपनी आभा के मध्य में बैठेंगे जो कि आपके अपने प्राणिक शरीर के प्राणों द्वारा चार्ज हुई है. अब इससे आप हर प्रकार के मानसिक प्रभावों जिन्हें आप देख पायें या ना देख पायें दोनों से सुरक्षित हैं.

अपनी आभा को मजबूत रखने के अपने बेहतरीन प्रयासों के बावजूद भी और दूसरों के सांसारिक भावों का असर हम पर ना हो इसका भी प्रयास करने के बाद भी दूसरों के कुछ विचार एवं भाव हमारी आभा में आ जाते हैं और हम पे प्रभाव डालते हैं जिससे हमारी चेतना का स्तर निम्न होता है और मूड भी निराशाजनक होता है. क्या किया जा सकता है ? इन गहरे रंगों को हलके रंगों में परिवर्तित किया जा सकता है- और इससे एक सकारात्मक मूड बनता है - उस आशीर्वाद के द्वारा जो हमें मंदिर क़ी या घर क़ी मूर्तियों एवँ देवों से प्राप्त होता है जब हम मंदिर या अपने घर के मंदिर में जाते हैं. इनको ध्यान के माध्यम से भी चार्ज किया जा सकता है. मंदिर में बराबर अपनी उपस्थिति दर्ज करा कर अपनी आभा को पवित्र किया जा सकता है और ध्यान द्वारा भी जिससे हमारी चेतना का स्तर ऊँचा होता है और मन का स्तर खुशहाल होता है.

अपनी आभा को पवित्र करने का एक महत्वपूर्ण समय होता है जब हम बाहर क़ी दुनिया में रहने के बाद अपने घर वापिस आते हैं. जो अभ्यास मैं इस विषय में प्रस्तावित करता हूँ कि पहले स्नान करें एवं उसके बाद पूजा स्थल वाले कमरे में जाएँ , मूर्ति एवं देवों का आशीर्वाद लेने के लिए, जिसके प्राप्त होने के बाद दुनिया कि ताकतों से छुटकारा मिलेगा और हमें प्रभु में स्थापित होने वाली चेतना को प्राप्त करने में सहायक होगा.

मंदिर में पूजा में शामिल होना आभा के शुद्धिकरण का और अधिक शक्तिशाली तरीका हो सकता है. मंदिर कि पूजा का एक आयाम जो बड़े पैमाने पे नहीं समझा जाता वो है इसका प्राण की धारा से जुडा होना. सिर्फ अंतिम आरती के समय को छोड़ कर, पूजा एक तरीका है मूर्ति को प्राण देने का. इसे कटे हुए फल , बना हुआ भोजन, जल , सुगन्धित फूल एवं दूध अर्पित करके किया जाता है. इसके बाद अंतिम आरती के समय , मूर्ति एवं उसके सहायक, यानि की देवता इस प्राण को वापिस हर भक्त की आभा में संचारित करते हैं, जिससे उनके अवचेतन मन की रूकावटे दूर हो जाती हैं एवं शुद्धता प्राप्त होती है. इसके बाद भक्त धन्य हो कर एवं उच्च चेतना की अवस्था में, अपनी मानसिक हालातों जिनसे उनपर दबाव था , मुक्त हो कर मंदिर छोड़ देते हैं.

अब मैं अध्यात्मिक साहचर्य के महत्व पर अपने गुरुदेव के सुझाव के अंतिम शब्द प्रस्तुत कर रहा हूँ , " शुद्धता बनाये रखने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि अपने को अच्छे देव स्वरुप व्यक्तियों के सान्निध्य में रखें , जिससे एक प्रकार के व्यक्ति से दूसरा कैसे भिन्न है इसकी जानकारी हो सके. बहुत सी मूर्ख , संवेदनशील आत्माएं, यह सोच के कि उनकी आध्यात्मिकता एक आत्मा को अंधकार कि दुनिया से ऊपर उठा सकती है , उस तरफ चल पड़ते हैं जहाँ महादेव भी नहीं जाते और देवता भी जाने से डरते हैं, सिर्फ यह पाने के लिए कि वे खुद फरेब और षड़यंत्र के शिकार हो गए हैं जो बहुत चालाक और षड्यंत्रकारी लोगों नें रचा था. हम मूर्ख नो बनें. हम उच्च चेतना एवं निम्न चेतना के बीच का अंतर समझें . उच्च चेतना के लोग उच्च चेतना वाले लोगो से घिरें ताकि वे शुद्धता को परिपूर्ण कर पायें." तिरुकुरल ने फ़रमाया है : " मन कि शुद्धता एवं आचरण की शुद्धता , यह दोनों इस बात पर निर्भर करते हैं कि आपके साथी कितने शुद्ध हैं."


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