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प्रकाशक के डेस्क से

दस मिनट की  एक आध्यात्मिक कसरत

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उन लोगों के लिए तैयार किया गया  एक संक्षिप्त  पथ्य जो आज के व्यस्त जीवन में आत्मनिरीक्षण के लिए कम या बिलकुल समय निकल पाने में असमर्थ हैं

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द्वारा सदगुरु बोधिनाथा वेलनस्वामी

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imageआजकल प्रतिदिन शारीरिक कसरत करने का विचार काफी प्रचलित है।  लगभग हरव्यक्ति यह मानता है कि एक  उत्पादक एवं संतुष्ट जीवन के लिए दुरुस्त  और स्वस्थ  होना जरुरी है।  तीन प्रकार के व्यायाम की सिफारिश की जाती है :सहनशील  , लचीला  एवं शाक्तिपूर्ण ।  प्रत्येक  के विशिष्ट लाभ हैं। सहनशीलता पूर्ण गतिविधियां , जैसे कि चलना , दौड़ना  एवं तैराकी , जीवन शक्ति बढाती हैं और हृदय , फेफड़ों एवं संचार प्रणाली को स्वस्थ रखती हैं।लचीलापन वाली गतिविधियां , जैसे हठ  योग , ता ई ची एवं नृत्य ,मांसपेशियों को आरामदायक अवस्था में रखते हैं एवं जोड़ों को गतिशील रखते हैं। शक्ति से जुडी गतिविधियां मांसपेशियों  के तंतुओं का निर्माण करती हैं एवं कंकाल प्रणाली को मज़बूत बनती हैं। इनमें शामिल हैं विकासविद्या, वज़न /प्रतिरोध व्यायाम एवं सीढ़ियां चढ़ना।

हमारे भौतिक शरीर का ख्याल रखना ज़रूरी है ; किन्तु जीवन में सर्वोत्तम प्रदर्शन के लिए , हमारी हस्ती के  सभी आयामों पर ध्यान देने की जरूरत है: शारीरिक, भावनात्मक /बौद्धिक एवं आध्यात्मिक। प्रत्येक महत्वपूर्ण है और अपने पर ध्यान दिये जाने वाले भाग का  हक़दार है। इन तीनों में से आध्यात्मिक या अधिचैतन्य आयाम की  आमतौर पर अत्यधिक उपेक्षा की जाती है ,जबकि यह हमारी हस्ती की सच्ची पहचान है और उसके  मूल में है। मेरे गुरुदेव नें लिखा था : "हमें अपने अवचेतन को इस विचार से समायोजित करना है कि हमारी हस्ती एक अधिचैतन्य हस्ती है , न कि एक पांच आवेगों से संचालित एक बौद्धिक हस्ती। हमारे मूल में जागरूकता है।"

हम शारीरिक स्वस्थ्य को व्यायाम से बनाये रखते हैं। हम सारा जीवन नई चीज़ें सीख कर अपनी बौद्धिक/भावनात्मक प्रकृति को पुष्ट करते हैं , अपनी मानसिक क्षमताओं को विस्तृत एवं सशक्त करते हैं। भावनात्मक प्रकृति पुष्ट होती है पारस्परिक रिश्तों को बारीकी से पुष्ट करने से , समर्पण एवं स्वीकृति का अभ्यास करने से , अच्छे चरित्र के गुणों का निर्माण करने से एवं दूसरों की  सेवा एवं एक संतुलित जीवन जीने से।

हम अपनी अध्यात्मिक प्रकृति को समय देते हैं रोज़मर्रा की धार्मिक गतिविधियों द्वारा। मैँ  इसको एक अध्यात्मिक कसरत कहना चाहूंगा। इस समय के दौरान , हमें याद दिलाया जाता है कि जीवन का आतंरिक लक्ष्य अध्यात्मिक प्रगति करना है , भगवान् की प्राप्ति के अंतिम लक्ष्य  स्वयं साक्षात्कार  की ऒर बढ़ना है , एवं अंततः पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होना है , मोक्ष की प्राप्ति करनी है। यह अपनी अध्यात्मिक प्रकृति को प्रयोग करने का इतना बड़ा  मुद्दा नहीं है जितना कि उसके अनुभव करने के लिए समय निकालने का है। तिरुमंतिराम शास्त्र बताता है : "कदम बा कदम , मन कि वापसी का अभ्यास करो एवं  भीतर देखो। एक एक करके, तुम अपने भीतर असंख्य अच्छी चीज़ें देखोगे। अभी और यहीं नीचे , तुम भगवान् से मिल सकते हो जिनको प्राचीन वेद अभी भी सब जगह ढूँढ़ रहे हैं।"

सामान्यता हम अपनी बाहरी प्रकृति में इतना उलझे होते हैं कि हम अपनी सच्ची , यशस्वी आंतरिक वास्तविकता को शायद ही जानते हैं। यह कई कई जीवन तक चल सकता है , जैसा कि कई लोगों के साथ होता है, जो कि बड़ी वास्तविकताओं के बारे में तभी सोचना शुरू करते हैं जब वे मृत्यु के बिंदु के  करीब होते हैं।

जीवन के शोरगुल से पीछे हट कर बिताये ऐसे समय के फायदे कम आंके जाते हैं और इनकी अनदेखी भी की जाती है, क्योंकि २ १ स्वीं सदी में जीवन अधिकाधिक व्यस्त और बाहरी रूप से दबावपूर्ण हो गया है। भारत में रहने वाले बहुत से रूढ़िवादी परिवार फिर भी अपनी अध्यात्मिक हस्ती के लिए सुबह के पूजा अपने घर के मंदिर में करने का समय आरक्षित कर लेते हैं , इसके बाद वे मन्त्रों का पुनर्उच्चारण एवं माला जपने को भी अंजाम देते हैं।

भारत एवं दूसरे देशों में , हालाँकि , ये प्रमुख चलन है कि कम से कम परिवार इस अनुशासन का पालन कर रहे हैं। मेरे साथ बैठ के , बहुत से लोग वही बात कहते हैं : "हम  पूजा , जप और ध्यान के लिए समय निकाल नहीं पाते हैं।" हमारा समय जो रोज़गार , परिवहन , खाने , मनोरंजन , शारीरिक व्यायाम और परिवार और मित्रों के साथ बीतता है उसमें पूरा दिन चला जाता है। पारम्परिक एक घंटे की धार्मिक कसरत काफी लम्बी साबित हो रही है , और चूँकि इसके लाभ अच्छी तरह नहीं समझे जाते , आम तौर पर इसे पुरणतया छोड़ दिया जाता है। मेरे गुरुदेव नें उन फायदों कि बात की , " अपने दैनिक  धार्मिक अभ्यासों के करने से नतीजा यह होगा कि आप बाहरी संसार की ताकतों का बहादुरी से मुकाबला कर पाओगे, बिना उनसे विचलित हुए  एवं जीवन के जिस भी दायरे को आपने चुना है उसमें अपना धर्मं पूरी तरह निभा पाओगे।  क्योंकि आपकी दैनिक साधना नें आपकी तंत्र प्रणाली पर नियंत्रण कर लिया होगा , दुनियां में आपके काम  कि गुणवत्ता बेहतर हो जायेगी, एवं आपका उसको करने का मूड भी आत्मविश्वास एवं निर्मलता से भरा होगा।”

तो फिर , इसका समाधान क्या है ? में मुख्यतया युवा वर्ग पर अपना ध्यान केंद्रित करता हूँ, क्योंकि उनके तौर तरीके बदलने के लिए बहुत कठोर नहीं होते। मैंने एक दस मिनट का कार्यक्रम तैयार किया है जिसमें चार गतिविधियां शामिल हैं जो जब भी समय उपलब्ध हों करी जा सकती हैं। आशा करता हूँ , दिन के समय की संक्षिप्तता एवं लचीलापन , साथ ही साथ इसके आध्यात्मिक फायदों का स्पष्ट ज्ञान , विद्यार्थियों को प्रेरणा देगा कि वे इस कसरत को अपनाएं , या ऐसा ही कुछ अच्छा , कार्यक्रम अपनी दिनचर्या के हिसाब से बनाएं। मेरा सुझाव है कि इस अभ्यास को पंद्रह वर्ष की आयु के लगभग शुरू किया जाये  एवं हाई स्कूल से ले कर  यूनिवर्सिटी तक चालू रखा जाये। स्कूलिंग के बाद , यह आशा की जाती है कि जो अध्यात्मिक जीवन के बारे में गम्भीर हैं वे इस कसरत को आधे घंटे तक बढ़ा देंगे।

आध्यात्मिक कसरत में चार गतिविधियां शामिल हैं : पूजा, आत्मनिरीक्षण , निश्चय पूर्वक कथन  एवं अध्ययन। पूजा वाले भाग में शामिल है एक चुने हुए देवता के मंत्र का जप करना  या देवता के नौ या अधिक नामों का जाप करना , मूर्ति या तस्वीर को चावल के दानें अर्पित करना , हर एक जप या नाम के साथ। मिसाल के तौर पर , अगर  भगवान् गणेश की पूजा की जा रही हो तो, ओम श्री गणेशाय नमः या अपनी परंपरा के और किसी मंत्र को शामिल किया जा सकता है। इसका विकल्प हो सकता है देवता कि मूर्ति या फोटो को देखते हुए एक  छोटा भजन गाना। श्रद्धा और कृतज्ञता की  इस सरल अभिव्यक्ति हेतु दो मिनट का समय समर्पित करें।

आत्मनिरीक्षण भाग में शामिल होगा अपनी आँखे बंद करके ओम मंत्र का नौ बार जाप करना। ओम के जप के प्रभावी होने के लिए मंत्र का उच्चारण ठीक प्रकार से किया जाना चाहिए। पहला शब्दांश ए है , जिसका अंग्रेजी के शब्द "अव", की तरह उच्चारण किया जाता है , परन्तु लम्बा किया हुआ  : "अ अ अ ". दूसरा शब्दांश ऊ  , जैसे कि अंग्रेजी शब्द 'रूफ' में जिसका उच्चारण होता है "ऊ ऊ ", किन्तु लम्बा किया हुआ : "ऊ ऊ ऊ  ". तीसरा शब्दांश है  म , जिसका उच्चारण होता है "म म " जिसमें सामने के दांत कोमलता से छूते हैं और बढ़ी हुई ध्वनि  होती है :"म म म म ". हर पुनरावृति की ध्वनि लगभग सात सेकण्ड होती है , जिसमे से दो सेकंड अ पर , दो सेकंड यू पर और तीन सेकंड म पर, जबकि अगली पुनरावृत्ति से पूर्व दो सेकंड का मौन होगा। तीनों शब्दांश इकठे चलते हैं : अ अ ऊ ऊ म म [मौन], अ अ ऊ ऊ म म [मौन], अ अ ऊ ऊ म म [मौन]. पहले शब्दांश अ के समय हम स्नायु गुछ एवं छाती में कम्पन महसूस करते हैं। दूसरे शब्दांश , ऊ , पर गले में कम्पन होती है। तीसरे शब्दांश , म , के समय सिर के ऊपरी भाग में कम्पन होती है। इस पर दो मिनट लगाएं।

पुष्टिकरण कथन वो कथन होते हैं जिनको अपने को ही पुनरावृत्ति करके सुनाया जाता है जिससे कि हमारे अवचेतन मन पर खास तरह के प्रभाव पड़ते हैं जिनसे भविष्य में सकारात्मक नतीजे मिलते हैं।  कसरत के इस भाग में शामिल होता है यह पुष्टिकरण कथन जिसकी पुनरावृत्ति नौ बार की जाती है "में बिलकुल ठीक हूँ ठीक इस समय ". दो अन्य पुष्टिकारक कथन जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है , वे हैं - "मेरी सभी आवश्यकताएँ सैदेव पूर्ण होंगी " एवं "में कर सकता हूँ , में करूँगा , में जो भी योजना बनता हूँ उसे पूरी करने की क्षमता मुझमे है।" पुष्टिकारक कथनों को असरदार तरीके से इस्तेमाल करने की तीन सूत्री कुंजी है : १) अपने मन को जो आप केह रहे हैं उसके मायनों पर केंद्रित करें , २) अपने मन में उस नतीजे का दृश्य पकड़ के रखें जिसे आप पाना चाहते हैं , एवं ३) अभी वर्त्तमान में वेह महसूस करें जैसा कि आप बाद में महसूस करेंगे, जब आप वेह प्राप्त कर लेंगे जिसका वर्णन पुष्टिकारक कथन में किया गया है। इस पर एक मिनट लगाएं।

अध्ययन भाग में शामिल है पवित्र हिन्दू ग्रंथों पढ़ना जो आपको नया ज्ञान एवं अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। यह महत्त्वपूर्ण है कि आप ऐसा ग्रन्थ चुनें जिसे आप स्पष्ट एवं प्रेरणादायक समझते हों, उन्हें अनदेखा करें जो स्पष्ट न हो या जो तकनीकी हो। आप पांच मिनट इसको समर्पित करें।

इन चार धार्मिक अभ्यासों के क्या फायदे हैं ? पूजा वाले भाग का फायदा यह है कि यह देवता के प्रति हमारी भक्ति को बढ़ाता है , जिससे देवी या देवता से हमारे रिश्ते बेहतर होते हैं। यह अंततः पूजा का पूरा अनुष्ठान [आत्मार्थ पूजा] करने की दिशा में स्वाभाविक पहला कदम है। ऒम के जप का आत्मविश्लेषी अभ्यास मन पर एक शांतिपूर्ण प्रभाव डालता है और हमारी ऊर्जा को मन के सबसे अधिक अध्यात्मिक भाग में बढ़ा कर , हमें उच्च श्रेणी के चक्रों की और  ले जाता है। यह एक स्वाभाविक पहला कदम होता है ध्यान के गहरे अभ्यासों के तरफ , जैसे कि अपने श्वासों पे नियंत्रण करना [प्राणायाम] और ऊर्जा को  इंद्रियों से वापस खींचना [प्रत्यहार], विचार प्रक्रिया को केंद्रित करना [धारणा] जो हमें ले जाता है अपनी अंतर आत्मा की प्रकृति के अनुभव  की तरफ  [ध्यान एवं समाधि]. पुष्टिकरण वाले  कथनों  को प्रति दिन दोहराना हमें अधिक सकारात्मक एवं आत्मा विश्वासी बंनने में सहायक होता है , यह हमें हम  जो कुछ भी करते हैं उसमें अधिक सफलता दिलवाता है। पुष्टिकारक कथन चिंता को मारने  की बड़ी शक्ति रखते हैं।  पवित्र ग्रंथों का अध्ययन हमारे विश्वास के प्रति हमारी जानकारी बढ़ाते हैं एवं हिन्दू दर्शन और अभ्यासों कि अंतर्दृष्टि कि उत्प्रेरणा देते हैं।

यह मन में रखना आवश्यक होगा कि अध्यात्मिक उन्नति कि मात्रा  जो हम अपने अंतिम लक्ष्य भगवन के अनुभव  की  ओर करेंगे , आत्मा साक्षात्कार , और तद्पश्चात पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति , वेह सीधे जुड़ा होगा उस समय कि मात्रा से जो हम धार्मिक अभ्यासों में लगते हैं।

ऋषि पतंजलि नें अपने योग सूत्र [1 .2 1 ;2 2 ] में उल्लेख किया है : "वो जिनमें दृढ़ निष्ठां होती है , समाधि उनके पास है। चाहे व्यक्ति का अभ्यास हल्का , माध्यम  या तीव्र , तो  उसका भी फर्क पड़ता है।" ऋषि इशारा कर रहे हैं कि अध्यात्मिक प्रगति केवल इस बात पर निर्भर नहीं है कि हम कितना समय अपने अभ्यास पर बिता रहे हैं , परन्तु इस बात पर भी निर्भर करती है कि हम कितने समर्पण , ऊर्जा एवं प्रयास उसमें डाल रहे हैं। उनका तीसरा छंद इस विषय पर [1 .2 3 ] कहता है : "समाधि ईश्वर को समर्पण से भी प्राप्त हो सकती है।" इसका मतलब है कि प्रयास एवं समर्पण भी पूरक साबित होते हैं उन आशीर्वादों और कृपा के जो हमें प्रभु के तीव्र समर्पण से प्राप्त होती है।


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