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कमल के पवित्र फूल को ध्यान से निहारिये
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प्रकाशक के डेस्क से

कमल के पवित्र फूल को ध्यान से निहारिये

हमारे स्वाभाविक स्वभाव से बौधिक एवं आध्यात्मिक की तरफ प्रगति करते हुए हमारी आत्मा एक सुंदर कमल की तरहं चमक के साथ खुल जाती है.



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हिन्दू दृष्टिकोण यह है कि देवत्व का बीज सबके भीतर है. मेरे गुरु के गुरु , श्री लंका के शिव योगस्वामी का इस विचार को व्यक्त करने का बड़ा ही सीधा साधा तरीका था. " सबको भगवान के रूप में देखो. यह मत कहो , " यह व्यक्ति डाकू है. वेह व्यक्ति व्यभिचारी है. वहां वेह व्यक्ति एक शराबी है. " यह व्यक्ति भगवान है. वेह व्यक्ति भगवान है. भगवान सबके भीतर है. बीज वहां है. उसको देखो और बाकी को अनदेखा कर दो." यह निश्चित रूप से आश्वस्त करने वाली बात है कि ऐसा कोई भी नहीं है जो एक दिव्य व्यक्ति नो हो--कि कोई भी एक अनंत नरक में जा कर खत्म नहीं होता. बल्कि , प्रश्न यह है कि कब किसी व्यक्ति कि दिव्यता का सार अपने को अभिव्यक्त करता है. ऐसा होने में कुछ और जीवन भी लग सकते हैं. आख़िरकार , सब आध्यात्मिक प्रगटीकरण एक धीमी और निष्ठुर प्रक्रिया है.

मेरे अपने गुरु , सिवाय सुब्रमुनियस्वामी नें आध्यात्मिक प्रक्रिया को व्यक्त करने के लिए एक अंतर्दृष्टिपूर्ण उपमान चुना जिसे संस्कृत में आध्यात्मिक विकास कहा जाता है. उन्होंने कमल की बात की, कैसे उसका बीज तालाब के अँधेरे कीचड़ में शुरू होता है. इसकी जड़े एक तने को उठने देती हैं जो पानी से होते हुए हवा में पहुँचता है. तने से एक कली विकसित होती है , शुरुआत में छोटी, जो एक फूल में बढती है जो की धीरे धीरे अपनी शानदार पंखुड़ियों को सूर्य की ओर खोलती है, उसका केंद्रीय अमृत एवं पराग मक्खियों को आकर्षित करता है. गुरुदेव इस प्रक्रिया की तुलना मनुष्य की प्रकृति एवं आध्यत्मिक प्रगटीकरण से करते हैं. कीचड़ हमारा सहज मन है. हम सभी एक या दुसरे जीवनकाल में कीचड़ से शुरुआत करते हैं. अपने शुरूआती विकास के दौर में हम अपरिष्कृत एवं निर्दयी होते हैं. हम दूसरों को घायल करते हैं और अपने विषय में अधिक व दूसरों के विषेय में कम सोचते हैं. शायद हम अंत में जेल में भी पहुँच जाते हैं. हम सब शुरुआत वहीँ करते हैं, जड़ों में , सहज मन के अंधकार में दुबे हुए, चाइना शॉप के बैल की तरह उधम मचाते हुए.

जीवन जीवन के पीछे चलता है जैसे जैसे हम जीते हैं और सीखते हैं. अंत में हम अपने सहज ज्ञान पर कुछ नियंत्रण पाते हैं एवं पानी के अन्दर सरक जाते हैं, जो की हमारा बौधिक मन है. हम सोचने वाले व्यक्ति बन जाते हैं, कोई ऐसा जो तार्किक रूप से निर्णय ले सके , कोई ऐसा जिसका सहज भावनाओं पे बुनियादी नियंत्रण हो जिससे की जब उसे धमकी प्राप्त हो तो वेह स्वचालित रूप से नाराज़ ना हो ओर लड़ाई ना करे.

इस बिंदु पे हम एक सहज- बौधिक व्यक्ति हैं, जो आंशिक रूप से अपने पशु प्रकृति के कीचड़ में रह रहा है, आंशिक रूप से अपनी पानी रूपी बुद्धि में. ऐसे व्यक्ति को भगवान एवं जीवन की पवित्रता का एहसास नहीं होता. संसार इस तरह के लोगों से भरा हुआ है, नास्तिक, पदार्थवादी एवं यथार्थवादी. वे जीवन के आध्यत्मिक उद्देश्य से अनजान हैं , वेह उद्देश्य जो इस अवतार से परे जाता है.

तब क्या होता है ? तना पानी की सतह से ऊपर उठ जाता है. वेह उठ कर पानी से निकल कर हवा में आ जाता है, जो अंतर्ज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है, हमारी आध्यात्मिकता का या कुछ मायनों में भगवान के होने का. हम धर्मं के बारे में सोचने लगते हैं ; हम अध्यात्मिक अभ्यासों के बारे में सोचने लगते हैं. केवल एक सहज एवं बौधिक व्यक्ति होने से, केवल मामूली चीज़ों के पीछे चलने से, सांसारिक व्यवसाय , हमें अब संतुष्ट नहीं कर पाते हैं. किन्तु अब कली बंद हो चुकी है , अभी परिपक्व होने एवं खुलने हेतु. बंद कली को पता है कि भगवान कहीं है परन्तु उसे उसका सीधा अनुभव नहीं हुआ है. कली खोलने का क्या कारण बनता है ? कई कई जीवन सीखना एवं परिपक्व होना , प्रबुद्ध प्राणियों का वरदहस्त, देवता का आशीर्वाद एवं अध्यात्मिक अभ्यास. कली को खोलने के लिए हमको जग्रितिपूर्वक प्रयास करना पड़ता है.

हिंदू धर्मं हमें धार्मिक अभ्यास देता है जिन्हें चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है. पहला है बस अच्छा आचरण , चरित्र निर्माण , चर्या . यह गहरे अभ्यासों के लिए नींव है. दूसरा है निष्काम सेवा , सेवा या कर्म योग - दुसरे लोगों के लिए कार्य करना जो हमें करना नहीं होता. इसे इस प्रकार से मैं परिभाषित करता हूँ. अगर हमारे कार्यस्थल पर हम कुछ करते हैं किसी दुसरे के लिए अपने दिल कि ख़ुशी के लिए, वेह सेवा के रूप में गिना जायेगा. सेवा केवल मंदिर या आश्रम में ही नहीं की जाती. अगर हम कार्य पर जाएँ और केवल वो करें जिसके लिए हमको भुगतान किया जा रहा है, कोई सेवा नहीं हो रही है.

अभ्यास का तीसरा वर्ग भक्ति है, जिसे हम मंदिर में अभिव्यक्त करते हैं और उस मंदिर में भी जो हमारे घर में है. एक घर के मंदिर कि अच्छी तरह देख भाल करके रखना और वहां रोज़ पूजा करना एक आवश्यक अभ्यास है. चौथा अभ्यास है ध्यान. ध्यान थोड़ा ऊँचा स्तर है और इसे ठीक तरह करने के लिए एक शिक्षक कि मदद चाहिए. ज्यादातर लोग जिनसे मैं बात करता हूँ , कहते हैं, "में कोशिश करके ध्यान करता हूँ पर अपने विचारों पे नियंत्रण नहीं कर पाता हूं." उनका कोई शिक्षक नहीं होता. उनको व्यक्तिगत रूप से किसी नें ध्यान करने की कला को समझाया नहीं है. कोई असामान्य व्यक्ति ही होता है जो ध्यान को अपने आप सीख लेता है.

इसी प्रकार , अभ्यास के चार वर्ग हैं अच्छा आचरण , सेवा, भक्ति एवं ध्यान. क्या होता है जब आप इनमें से कुछ अभ्यासों को ले लेते हो एवं उन्हें नियमित रूप से क्रियान्वित करते हो ? कली धीरे धीरे खुलती है . आपका देवत्व जो चुपचाप बीज में इंतजार कर रहा था , खिल जाता है. कई पश्चिमी विचार एवं उद्देश्य इस दृष्टिकोण पर आधारित हैं की जीवन केवल एक होता है- या फिर शायद केवल एक जीवन ही होता है- इसलिए उचित होगा कि सबकुछ हम इस जीवन में ही कर लें. बेहतर होगा कि हम भगवान कि प्राप्ति भी इसी जीवन में हासिल कर लें. हिंदू दृष्टिकोण , इस विश्वास पर आधारित है कि हम कई जीवन जीते हैं , वेह है : " मुझे मालूम है में वापिस आऊंगा ; कोई जल्दी नहीं है. में इस जन्म में जितना कर सकता हूँ करूँगा और आगे बढ़ने के लिए बहुत सारा समय होगा." हिंदू दृष्टिकोण है कि हर जीवन काल में आध्यात्मिक विकास किया जाये - कली को थोड़ा और खोला जाये. हम संतुष्ट हैं ध्रितिपुर्वक अभ्यास करते हुए आगे बढ़ने में , जितनी भी संजीदगी से हम इसे कर सकते हैं , बिना भागे हुए , बिना किसी गिरने के डर के. हम इस बात के लिए आश्वस्त हैं कि देवत्व का बीज हम में से हर एक में विराजता है.

हिंदू धर्मं उस विचार को एक कदम आगे ले जाता है : अन्तातेह हम में से हर एक भगवान का साक्षात्कार कर पायेगा, हमारे अंदर रह रही आत्मा. श्वेताश्वतारा उपनिषद् कहता है , " वेह जो आत्मा के सत्य के साथ , आत्मा , एकीकृत , ब्रह्मा के सत्य को समझता है जैसा कि एक दीपक , जो भगवान को जानता है , जो पैदा नहीं हुआ , जो स्थिर है , होने के सभी रूपों से मुक्त है , उसका सब बंधनों से छुटकारा होगा." यह पश्चिमी मतों में प्रचिलित अवधारणा से काफी भिन्न है जिसमे यह मन जाता है कि भगवान स्वर्ग में है और उसका अनुभव धरती पर रहने वाले लोग नहीं कर सकते. गुरुदेव अक्सर दिव्य उपस्थिति कि उपलब्धता कि बात किया करते थे : " भगवान हमारे बहुत पास है. वेह हमारे श्वासों से भी पास है, हमारे हाथों और पैरों से भी पास है. हाँ, वेह हमारी आत्मा का सार है ."

अपने कमल के फूल के दृष्टान्त पे वापस चलते हैं. जब कमल का फूल प्रयाप्त खुला होता है , हम सजीवता के साथ अपने आध्यात्मिक एवं अंतर्दृष्टि वाली प्रकृति में जीना शुरू कर देते हैं. आइये हम प्रश्न पूछते हैं, "वो क्या है जिससे आध्यात्मिक प्रगति होती है ? वोह क्या है जिससे प्रगटीकरण होता है ?" यह आत्मा है. आध्यात्मिक प्रगटीकरण के बारे में सोचते हुए , आत्मा की प्रकृति के बारे में समझना सहायक होगा. हम आत्मिक शरीर एवं उसके सार के बीच अंतर करते हैं. यह सार दो परतों में है : कभी ना परिवर्तित होने वाली शुद्ध चेतना एवं उत्कृष्ट पूर्ण वास्तविकता , समय, रूप एवं स्थान से परे. आत्मिक शरीर मनुष्य की तरह , स्वयं दीप्तिमान प्रकाश पुंज जो विकसित एवं परिपक्व होता है. इसी अमर आत्मिक शरीर को संस्कृत में आनंदमय कोष [आनंद की म्यान ] कहा गया है. यह आत्मिक शरीर ही है , जो कमल के फूल की तरह, प्रगट होता है. आत्मा का सार सनातन रूप से संपूर्ण , भगवान के जैसा होता है.

ठीक जैसे हमारा भौतिक शरीर एक बच्चे से व्यस्क में परिपक्व होता है , इसी प्रकार यह स्वयं प्रकाशमान शरीर जो प्रकाश से बना है चमक और बुद्धि में परिपक्व होता जाता है एक जीवन से दुसरे जीवन में, धीरे धीरे अपने आतंरिक तांत्रिक प्रणाली को सशक्त करते हुए, भगवान क़ी अज्ञानता से भगवान क़ी सिद्धि क़ी ओर विकसित होता है.

गुरुदेव नें अपने आत्मिक शरीर के रहस्यमय अनुभव को शिव के साथ विलय में इन शब्दों में बांटा : " एक दिन आप अपने खुद की हस्ती को देखेंगे , अपने दिव्य आत्मिक शरीर को. आप इसको अपने भौतिक शरीर के भीतर देखेंगे. यह देखने में साफ और स्पष्ट प्लास्टिक की तरह लगेगा. इसके आसपास एक नीली रौशनी और इसकी रूप रेखा सफ़ेद पीले रंग की होगी. इसके भीतर नीला - पीला सा प्रकाश एवं अरबों छोटी तांत्रिक धाराएं और उनसे बहता हुआ प्रकाश. यह शरीर एक कमल के फूल पर खड़ी होती है. आप जब अपने पैरों के बीच से देखेते हैं आप देखेंगे कि आप एक बड़े , ख़ूबसूरत कमल के फूल पर खड़े हैं. इस शरीर का सर है , इसकी आँखे हैं एवं इसकी अनंत बुद्धि है. यह सम्पूर्ण उर्जा के केंद्र से जुड़ा और संवर्धित हो रहा है.

आध्यात्मिक प्रगटीकरण का एक और आयाम भी है. एक ऐसे हिन्दू संत, स्वामी या योगी जो जीवित हो या गुज़र गया हो को चुने , जिसको आप महसूस करते हैं कि उसने आध्यातम क़ी बड़ी उपलब्धि हासिल क़ी. अब कल्पना कीजिये और इस विचार को स्वीकार कीजिये उसकी उपलब्धि आपकी अपनी क्षमता है. यह एक आश्चर्यजनक सत्य है. उस उपलब्धि को हासिल करने क़ी क्षमता जो किसी और ने हासिल क़ी है अध्यात्मिक तौर पर आपके अन्दर है जो क़ी किसी समय भविष्य में सामने आ सकती है. शायद यही विचार आपको प्रेरित करेगा कि आप उन आध्यात्मिक अभ्यासों में कुछ और अधिक प्रयास जुटाएं ! कमल के सम्पूर्ण फूल कि कल्पना करें, जबरदस्त खिला हुआ - वो प्रतीक होगा आपके पूर्ण , शानदार आध्यात्मिक क्षमता का .

बेशक , यह क्षमता तभी व्यावहारिक होगी जब आप इसके लिए प्रयासरत होंगे. अगर आप अपनी तलाश के प्रति गंभीर हैं, अपने आप से कुछ प्रश्न पूछिए : में अपने जीवन में कैसे चार प्रकार के अभ्यासों को लागु कर रहां हूँ ? अच्छा आचरण ? सेवा ? भक्ति ? ध्यान ? एवं योग ? कौन से क्षेत्र हैं जिन्मे मुझे अधिक ध्यान और प्रयास की आवश्यकता है ? मुझे अपने को बेहतर करने के लिए क्या करना चाहिए ? तब फिर उसे करें.