Hinduism Today Magazine Issues and Articles
गंभीर तनाव का प्रबंधन
Category : Hindi - हिंदी



| Kannada | English |

प्रकाशक के डेस्क से: गंभीर तनाव का प्रबंधन



द्वारा सतगुरु बोधिनाथा वेलनस्वामी

लगभग हर कोई आजकल जीवन की बढ़ती तीव्रता की चुनौती का सामना कर रहा है। संतुलन बनाये रखने के लिए यहाँ कुछ औज़ार दिए जा रहे हैं



नियमित आधार पर में हिंदुओं से मिलता हूँ , जो अधिकांश दुनिया की तरह, भावनात्मक रूप से परेशान हैं और मानसिक रूप से व्यथित हैं , रोज़मर्रा की गतिविधियों से बराबर बनते तनाव के कारण। यह विशेष रूप से सामान्य होता है जब दोनों पति और पत्नी अत्यधिक काम की अपेक्षा रखने वाली आजीविका में कार्यरत हों, ऐसे काम देने वालों के नीचे जो उनसे लम्बे घंटों तक असाधारण स्तर के प्रदर्शन की उम्मीद रखते हों। यह जानना भी असामान्य नहीं होगा कि वे दो या इससे ज़्यादा बच्चों का लालन पालन भी कर रहे हैं। रोज़ाना का काम और परिवार का दबाव उससे ज़्यादा है जो वास्तविकता में चौबीस घंटे के दिन में शामिल हो सके। कुछ मिसालों में कई सालों के रोज़ाना बराबर बहुत कुछ करने के परिणामस्वरूप गंभीर तनाव उत्पन्न हो जाते हैं।

कुछ प्रकार के तनाव स्वतः ठीक करने वाले होते हैं। हमें अपनी नौकरी से निकल दिया जाता है और इस परिस्थिति में कुछ माह बिना मासिक आय के तनाव को अनुभव करते हैं। हालाँकि , जब हमें नई नौकरी मिल जाती है , तनाव स्वतः ही दूर हो जाता है। एक तूफान हमारे घर को नष्ट कर देता है। तनाव तत्काल और महत्वपूर्ण है , परन्तु एक बार जब हम नया घर बना लेते हैं , वह स्वतः हल हो जाता है। दैनिक गतिविधियों की निरंतर मांग एक तरह का तनाव पैदा करता है , जो किसी भी क्रिया कलाप से कम नहीं किया जा सकता। वास्तव में यह साल दर साल और गहनता से फ़ैल सकता है। इस तरह के पुराने तनाव का सामना करते हुए , यह विवेकपूर्ण एवं स्वस्थ होगा कि इसे कम करने के तरीके ढूंढे जाएं.

मेरे गुरु , सिवाय सुब्रमुनियास्वामी नें तनाव प्रबंधन के लिए अनेक उपयोगी अभ्यास दिए। पहला श्वास नियंत्रण था। उन्होंने लिखा है : “रहस्यवादी का लक्ष्य जागरूकता को नियंत्रित करना है जबकि वह चेतन मन [ बाहरी दुनियां ] में है - यह जानने के लिए की वह चेतना में कहाँ हैं। जब वह पाता है कि वह चेतन मन में जागरूक है और पांच इन्द्रियां उसके शासक बन गए हैं , तो वह जागरूकता को चेतन मन के भीतर ही नियंत्रित करता है। वह ऐसा कई तरीकों से करता है। एक तरीका श्वास के नियंत्रण द्वारा है। श्वास जीवन है , और जीवन श्वास है। श्वास हमारी इच्छा शक्ति को नियंत्रित करने वाला साधन भी है। एक साधक को ज्ञानोदय के मार्ग पर चलने के लिए एक गतिशील इच्छा विकसित करनी चाहिए ताकि उसे ठोकर न लगे और वो लड़खड़ाए नहीं , पर आगे बढ़ता जाये , चाहे रास्ता कितना भी कठिन क्यों न प्रतीत हो।”

जब सांस लेने की बात आती है, तो मौलिक अभ्यास यह सुरक्षित करना है कि आप अपने मध्यपट से साँस ले रहे हैं और अपनी छाती से नहीं। यह श्वास लेने का प्राकृतिक तरीका है। बच्चे स्वाभाविक रूप से ऐसे ही सांस लेते हैं। हालाँकि जब हम जीवन के तनावों का सामना करते हैं , मध्यपट सिकुड़ जाता है और सीने का विस्तार करके सांस लेने की ओर प्रवृत होते हैं। मध्यपट को आपके स्नायु गुच्छ के ठीक नीचे महसूस कर सकते हैं , उस जगह जहाँ पसलियां अलग अलग होती हैं। उसे ढूंढने के लिए अपनी उँगलियों को मध्यपट के ऊपर रखें और खाँसे। जब आप की उँगलियाँ सीधे मध्यपट पर होंगी , जब आप खांसेंगे तो वो उछलेंगी। मध्यपट श्वास लेना सीखने का एक आसान तरीका है ज़मीन पर लेट जाएं और अपने पेट पर एक किताब रख लें। जब आप आराम करते हुए श्वास लेंगे तो मध्यपट पेट में नीचे की ओर बढ़ेगा , जिसके कारण किताब ऊपर उठेगी। जब आप श्वास बाहर निकालेंगे , मध्यपट पूरी तरह विश्राम करेगा और किताब शुरूआती अवस्था में वापिस आ जाएगी। इस तरह से परेशानी से मुक्ति प्राप्त होती है और तनाव कम हो जाता है। गुरुदेवा नें इस पर टिपण्णी की : “आप अनुभव करेंगे कि जब तंत्रिका धाराएं मध्यपट श्वास के माध्यम से शांत हो जाती हैं , तो हताश होना असंभव हो जाता है और अपने भीतर समाहित होना संभव जाता है, आंतरिक शिक्षण के महान हॉल में , अपने भीतर के महान खालीपन में , अपनी सारी समस्याओं , परेशानिओं और भय , बिना उनका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किये बिना।”

एक बार जब आप मध्यपट श्वास लेने की मूल बातें समझ लेते हैं , तो आप इसका अभ्यास एक कुर्सी पर सीधे बैठ कर या फिर चलते हुए भी कर सकते हैं। जब भी आप को आराम की ज़रूरत हो , जैसे कि किसी महत्वपूर्ण बैठक या परीक्षा के पहले या उसके दौरान , केवल मध्यपट से एक मिनट के लिए गहन सांस लेनी होगी।

पुराने तनाव को कम करने के लिए दूसरा अभ्यास है योग विराम , इसमें भी श्वास शामिल है। फर्श पर या किसी सपाट , मज़बूत सतह पर अपनी पीठ के बल लेट जाईये। बाहें अपने किनारों पर रखिये , एक गहन साँस लीजिये और अपने शरीर और दिमाग को शांत हो जाने के निर्देश दीजिये , ताकि सभी विचारों और तनावों को वे त्याग दें। अपने आप को एक बादल के ऊपर तैरता हुआ देखिये , रोज़ाना ज़िन्दगी की सभी परेशानिओं और उथल पुथल के ऊपर। आँखे बंद किये हुए , भीतर मध्यपट से श्वास लीजिये , देखिये एक शक्तिशाली प्रकाश को अपने स्नायु तंत्र में जो आपके शरीर और दिमाग को ऊर्जा से भर दे। बहार श्वास निकलते हुए , इस प्रकाशमय ऊर्जा को स्नायु तंत्र से बाहर अपने शरीर के हर अंग में जाते हुए महसूस कीजिये और देखिये जैसे कि इससे आपके सारे विचार और तनाव निष्कासित हो रहे हैं। इस को पांच मिनट तक दोहराएं और आप कम तनावपूर्ण महसूस करेंगे , क्योंकि जैसे ही शरीर विश्राम अवस्था में जाता है , दिमाग भी साथ ही जाता है। गुरुदेवा नें लिखा : “दुनियां के तनावों से स्वतंत्रता उस हद तक ही प्राप्त होती है जिस हद तक लोग अपने मन की शक्तियों को नियंत्रित कर पाने में सक्षम होते हैं। इस नियंत्रण में वे अपनी आंतरिक सुरक्षा की शक्ति पर निर्भर रह सकते हैं , जो कि क्षण के अनंत काल में प्राप्त होती है। उसी क्षण में , आपकी आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है। इसलिए अपना योग विराम लें जब भी आप थोड़ा सा भी थका हुआ महसूस कर रहे हों , थोड़े घबराये हुए हों , थोड़े परेशान हों। वो समय है , ना की जब आप के पास समय है।”

तनाव के प्रबंधन के लिए एक तीसरा अभ्यास है हर सुबह एक छोटे आध्यात्मिक /धार्मिक अभ्यास के लिए समय निकलना। गुरुदेवा इसे एक दैनिक सतर्कता कहते थे और इस पर यह टिप्पणी दी : “धर्मनिष्ठ हिन्दू दैनिक सतर्कता का निर्वाह करते हैं , जिसे संध्या उपासना कहते हैं , आमतौर पर सूर्योदय से पूर्व। यह पवित्र समय जो पूजा , जप , मंत्रोच्चारण , गायन , हठ योग , ध्यान और शास्त्रीय अध्ययन निजी जीवन की नींव है।” सुबह एक दैनिक सतर्कता रखने से हमें धार्मिकता की भावना को गहन करने में और उस पर केंद्रित रहने में आने वाले दिन का सामना करने के लिए मदद मिलती है।

मैंने अपने जनवरी /फरवरी /मार्च 2014 के प्रकाशक के डेस्क द्वारा दैनिक सतर्कता के लिए एक रुपरेखा दी थी जिसका शीर्षक था , “10 मिनट का एक आध्यात्मिक अभ्यास” . यह उन लोगों के लिए एक संक्षिप्त दैनिक प्रारूप है जो पाते हैं कि आज की व्यस्त ज़िन्दगी में आत्मनिरीक्षण के लिए कम या न के बराबर समय है। यह अब विभिन्न मन्त्रों और अभ्यासों के साथ एक मुफ्त मोबाइल ऐप्प के रूप में “आध्यात्मिक अभ्यास” शीर्षक से उपलब्ध है जिसे संन्यासियों द्वारा परिकल्पित किया गया है।

एक चौथा अभ्यास हठ योग का है , शारीरिक मुद्राओं की एक योग प्रणाली , विशिष्ट अनुक्रमों में समन्वित सांस के साथ किये गए आसन। मुद्राएं सरल से कठिन तक हैं। पुराने तनाव को कम करने के लिए सरल अभ्यास पर्याप्त हैं। गुरुदेवा नें हठ योग के फायदों का वर्णन दिया : “हठ योग का उद्देश्य आज फिर से एक ही है , “ भौतिक शरीर , भावनात्मक शरीर , सूक्ष्म शरीर और मानसिक शरीर को सौहार्दपूर्ण , स्वस्थ और खुश रखना ताकि भीतर की जागरूकता दिव्य अहसास की ऊंचाई तक उड़ सके। नियंत्रित श्वास के साथ सावधानीपूर्ण कार्यान्वित किया गया प्रत्येक आसन , रंग का अवलोकन करते हुए और भीतर की आवाज़ को सुनते हुए , धीरे धीरे अवचेतन मन के भीतर , वासनाओं की गांठों को खोलती है और वहां से जागरूकता को मुक्त करती है आकाश छूने वाली चेतना की ओर। हठ योग चेतना को खोलता है , क्योंकि जब ऊर्जा की ऊंचाई , चरम सीमा , हर मुद्रा में पहुँच जाती है और हम अगले आसान मैं बदलते हैं , एक छोटा या बड़ा समायोजन शारीरिक और सूक्ष्म तंत्रिका तंत्र के भीतर होता है।” मार्च 2001 हिन्दूइज़्म टुडे के अंक में छपे लेख में गुरुदेवा के 24 मुद्राओं को सिखाने वाली प्रणाली को देखें।

मेरे गुरु नें एक बिलकुल अलग दृष्टिकोण के बारे में भी बात की , यह सुझाव दिया कि हम तनाव के साथ अपना रिश्ता बदलें , उसकी अनिवार्यता को अपने लाभ में बदलें। उन्होंने सलाह दी , “लोग इन दिनों तनाव के बारे में उलझन में हैं। एक समाधान है और वह है चेतना में बदलाव, उस तरीके को बदलना जिसमें हम योजनाबद्ध किए जाते हैं ..... इसके मायने हैं तनाव को ‘हाँ -हाँ’ न कि ‘नाँ -नाँ’ में स्वीकार करना। पुराने दिनों में योग केवल मात्र तनाव दूर करने वाली गोली नहीं था। यह दिमाग और तंत्रिका तंत्र को ज़्यादा तीव्र बना देता था , न की कम। तनाव तीव्रता के लिए एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया है। तनाव हमारा शिक्षक है जो हमें तीव्रता का सामना करने मदद करता है। बाथरूम के शीशे में देखें और मानसिक रूप से अपने आप से कहें , ‘तनाव मुझे मज़बूत कर रहा है। ‘ यह सचमुच करता है। इसपर विश्वास करने की कोशिश करें। तनाव का आनंद लेना शुरू करें और उस ताकत को जो यह आपको दे रहा है। हमारे विश्व के नेता , धार्मिक नेता और सांसद , कहाँ होते अगर वे तनाव को स्वीकार नहीं करते और तनाव से ऊपर नहीं उठते ?... सम्पन्न व्यवसायी , शानदार खिलाड़ी , उच्च श्रेणी के कलाकार और मंजे हुए संगीतकार अधिक की चाह कर रहे हैं। वे इसे चाहते हैं। वे इस पर कामयाब होते हैं। वे जानते हैं यह उनसे सामान्य से उच्च स्तर पर प्रदर्शन करवा रहा है। वे जानते हैं कि कमज़ोर आत्माएं इसे नहीं ले सकतीं और इससे उन्हें ब्रह्माण्ड मैं शीर्ष स्थान पर एक खास जगह मिलती है।”

गुरुदेवा हमें हमारा पांचवा अभ्यास देते हैं : “पर आपको तनाव को संभालना होगा। आप इसे कैसे संभालेंगे ? किसी भी और चीज़ की तरह। आप भगवान के पास भीतर जाते हैं ; आप भगवान् के पास मंदिर में जाते हैं और आप अंततः आप तनाव से मुक्ति पाते हैं , भीतर से बाहर तक , और इसकी वजह से आप बेहतर इंसान बनते हैं , क्योंकि आपको अपने तंत्रिका तंत्र का विस्तार करना पड़ा है। आपको अपने तंत्रिका तंत्र को फैलाना पड़ा है। आपको अपनी उन मस्तिष्क की कोशिकाओं का उपयोग करना पड़ता है जिन्हें आपने पहले कभी नहीं इस्तेमाल किया था, आपको मन का विस्तार करना पड़ा , नई क्षमताओं को जागृत करने के लिए। यह आसान नहीं है।”