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  • समर्पण सभी योगों के लिए केंद्रीय है
  • समर्पण सभी योगों के लिए केंद्रीय है

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    समर्पणसभीतरहकेयोगमेंप्रमुखहै


    यहशायदएकमहानब्रह्मांडीयविडंबनाहैकिहमारेअमरस्वयंको  पानेकेलिएहमेंअपनेनिजीस्वयं  कोत्यागनाचाहिए द्वारासतगुरुबोधिनाथावेय्लान्स्वामी




    By Satguru Bodhinatha Veylanswami

      वेव्यक्तिजोधार्मिकनहींहैं, जीवनमेंअपनेलक्ष्योंकीप्राप्तिकेलिएअपनेस्वयंकेप्रयासोंसेआगेबढ़तेहैं।उनकीजोभीउपलब्धिहोतीहै , वहउनकेअपनेदृष्टिकोणसेकेवलउनकेस्वयंकेप्रयासोंकेपरिणामस्वरूपहोतीहै।  जोलोगधार्मिकहैंउनकेजीवनमेंएकअन्यकारणभीहोताहैदिव्यशक्तिओंकीसहायता।  यहांतक ​​किबौद्धधर्ममेंभी, जोकिएकसर्वौच्चशक्तिकोमान्यतानहींदेता , उच्चशक्तिकोआत्मसमर्पणकरनेकाविचारमौजूदहै, क्योंकिअनुयायी,  बुद्ध, उनकेशिक्षणऔरभाईचारेमेंशरणलेतेहैं।धार्मिकव्यक्तिआत्मसमर्पण , विनम्रप्रस्तुतिऔरदैवीयशरणलेनेकेद्वाराअपनेजीवनमेंआशीर्वादआमंत्रितकरतेहैं। व्यक्तियोंकेईश्वरकोसमर्पणकरनेसेपहले, उनकीस्वतंत्रइच्छाउनकीस्वाभाविकप्रकृतिकीअभिव्यक्तिप्रतीतहोतीहै , यहकेंद्रितहोतीहैउसइच्छाकीपूर्तिकेलिए, जो  अक्सरउनकोदुनियांमेंअधिकउलझातीहै।यदियहसहजइच्छाशक्तिनाकामहोतीहैयावेअपनेलक्ष्योंकोप्राप्तकरनेमेंविफलहोतेहैं, तोप्रतिक्रियाअक्सरहताशाऔरक्रोधहोतीहै।भयऔरचिंताभीआमतौरपरअनुभवकियेजातेहैं।भक्तजोईश्वरकोआत्मसमर्पणकरचुकेहैं, ईश्वरकोएकव्यक्तिकेरूपमें, फिर  क्रोधितनहींहोतेहैंयाडरऔरचिंतामेंनहींरहतेहैं।जैसाकिमेरेगुरुदेवनेलिखाथा, जबमुश्किलसमयआतेहैं, तोवेजानतेहैंकिवेसंचितऔरउलझाववाले, कठिनकर्मोंसेअबाधहोरहेहैंयापूरीतरहसेएकनईदिशामेंबदलरहेहैं।वेजानतेहैंकिऐसेसमयमेंउन्हेंजानबूझकरअपनीस्वतंत्र, सहजइच्छाशक्तिकोआत्मसमर्पणकरनाचाहिए  औरईश्वरीयघटनाओंसेनहींलड़नाचाहिए, परन्तुदैवीयइच्छाओंकोअपनेजीवनकामार्गदर्शनकरनेकीअनुमतिदेनीचाहिए।

    भक्तियोगमेंभक्ति

    जबहिंदूधर्मकेअंदरआत्मसमर्पणदेखरहेहों , तोभक्तियोगकेबारेमेंपहलेविचारकरनास्वाभाविकहै।वास्तवमें, भक्तियोगकाएकवैकल्पिकशब्दशरणागतियोगहै,  आत्म-समर्पणकायोग।यहभक्तिकेअनुशासनजैसेकिअनुष्ठान, पूजा, प्रार्थना, जपऔरगानेद्वाराहृदयमेंप्रेमकी  जागृतिकेउद्देश्यसेएवंअपनेआपकोभगवानकीकृपाहेतुखोलनेकाअभ्यासहै।इसप्रकारकेअभ्यास  मंदिर, प्रकृतिऔरघरकेमंदिरमेंकियेजातेहैं।भक्तियोगईश्वरीयसेघनिष्ठसम्बन्ध, प्रेमभाव, निस्वार्थताऔरपवित्रताजैसेगुणोंकेविकासकेसाथसामंजस्यतलाशनाचाहताहै, जोइसतरहकेगहनसंबंधोंकोसंभवबनाताहै। हिंदूधर्ममें, आत्माइनअभ्यासोंकेमाध्यमसेभगवानकेकरीबऔरक़रीबतरआतीहै।वैष्णववादमें, भक्तकोभगवानकेसाथपांचस्तरोंकेसंबंधोंकेमाध्यमसेप्रगतिकरतेहुएदेखाजाताहै: तटस्थता; दासता, दोस्ती, पैतृकआचरण, औरप्रेमभाव।  शैववादकाजीवऔरशिवकेरिश्तोंसेजुड़ाएकमिलताजुलतानमूनाहै।अंतिमचरणकोप्रापत्ति  याआत्मनिवेदनकहाजाताहै, जिसेईश्वरकोबिनाशर्तसमर्पणकेरूपमेंपरिभाषितकरतेहैं। मेरेगुरु, सिवायासुब्रुमीनियास्वामी, नेसाझाकिया: आपपूछसकतेहैंकिआपजिसचीजकोदेखनहींसकतेउसेआपकैसेप्यारकरसकतेहैं।फिरभी, भगवानदेखे  जासकतेहैंऔरदेखेभी  जातेहैं , परिपक्वआत्माओंद्वारा , एकआतंरिकअनुभूति  केमाध्यमसेजिसेवेजाग्रतकरचुकेहैं।यहमानसिकजागृतिधर्ममेंपहलीदीक्षाहै।हरहिंदूभक्तभगवानकोमहसूसकरसकताहै, भलेहीवहअभीतकउन्हेंअंदरसेनहींदेखसकता।यहसूक्ष्मभावनाप्रकृतिकेमाध्यमसेसंभवहै।  वहमंदिरमेंदेवताओंकीउपस्थितिमहसूसकरसकताहै, औरवहअप्रत्यक्षरूपसेअपनेजीवनमेंउनकेप्रभावकोदेखसकताहै।

    कर्मयोगमेंभक्ति

    जबकिअधिकांशटीकाकारमानतेहैंकिआत्मसमर्पणभक्तियोगमेंप्रमुखहै, कुछहीलोगकर्मऔरराजयोगमेंइसकेमहत्वकोमानतेहैं।कर्मयोगसेवाऔरपवित्रक्रियाकापथहै।अपनेगहनअर्थोंमें, यहसभीकार्योंकोएकआध्यात्मिकतरीकेसेकरनाहै, उसेईश्वरकोजागरूकतासेअर्पितकरतेहुए. इसेऐसामानाजासकताहैजैसेईश्वरकीपूजा, सभीप्राणियोंकीसेवाउसकाहीजीवंतरूपमानकेकीजाये ! सभीकार्योंकाफलभगवानकोसेवाकेरूपमेंआत्मसमर्पणकरदियाजाताहै, संस्कृतमेंइसअवधारणाकोईश्वरअर्चनाबुद्धि  केरूपमेंजानाजाताहै। आमतौरपरकर्मयोगएकमंदिरयाआश्रममेंकियाजाताहै, परन्तुबुद्धिमत्ताइसमेंहोगीकिआपअपनेजीवनकेक्षेत्रमेंव्यापकरूपसेजितनासंभवहो , सेवाकाविस्तारकरें , जैसेकिअपनेकार्यस्थलमेंदूसरोंकीमददकरना, अपेक्षासेअधिककार्य, स्वेच्छासेऔरशिकायतकेबिनाकरना।घर, मंदिरयाआश्रममेंछोटेमेहनतवालेकार्यकरना, गर्वकोनियंत्रितकरने  औरनम्रताकापोषणकरनेकाएकप्रभावीतरीकाहै।व्यावहारिकरूपसेकहेंतो , इसमेंबर्तनधोने, कपड़ेधोने, रसोईऔरस्नानघरकीदेखभाल, बगीचोंमेंकामकरना, खिड़कियोंकोधोनेऔररास्तोंकीसफाई  बिना  प्रशंसाकीआशाऔरउम्मीदकेकरनाशामिलहैं। भगवानतकपहुंचनेकेउद्देश्यसेकियागयाहमाराकामस्वाभाविकरूपसेइसपरिप्रेक्ष्यकीओर  लेजाताहैकिप्रत्येककार्यभगवानकेलिएअर्पितहै।प्रत्येककार्य, सबसेबड़ेसेसबसेनिम्नतम, एकपवित्रसंस्कारबनजाताहै।कर्महीपूजाहै।समस्त  जीवनपवित्रहोजाताहैऔरधर्मनिरपेक्षऔरआध्यात्मिककेबीचकासंघर्षसमाप्तहोजाताहै। कर्मयोगअंततःयहअनुभूतिकरासकताहैकिब्रह्माण्डसबईश्वरकाकियाधराहै।  यहअंतर्दृष्टियहनजरियादेतीहैजिसकेअंतर्गतनकेवलकर्मकेफलकात्यागहोबल्किकरताहोनेकेभावकोभीसमर्पितकियाजाये।गुरुदेवइसपरएकअंतर्दृष्टिसाझाकरतेहैं: स्वयंकोवास्तविकताकेसन्दर्भमेंकेंद्रितकरना , नकिभौतिकवस्तुओंको , जबकिजीवनशक्तिबराबरइनतंत्रिकाधाराओंकेमाध्यमसेतेजप्रभावसेबहरहीहै , आपवास्तवमेंदेखरहेहैंकिजोआपकररहेहैंवोशिवयाईश्वरकेलौकिकनृत्यकाहिस्साहै , जैसेकिशिवकीऊर्जाआपकेअंदरव्आपकेमाध्यमसेप्रवाहितहोरहीहै।परमगुरुयोगास्वामीनेअपनेचारमहानवचनोंमेंसेएककेद्वारायहसादगीसेकहा: शिवहीयहसबकररहेहैं।

    राजयोगमेंभक्ति

    समर्पणकोराजयोगमेंकममान्यताप्राप्तस्थानमिलाहै , जैसाकीपतंजलिनेंअपनेयोगसूत्रोंमेंउल्लेखकियाथा. राजयोगकीशुरुआतहोतीहैनैतिकप्रतिरोधोंऔरधार्मिकक्रियाकलापोंसे, जिसकेबादएकाग्रता, ध्यानऔरचिंतनकेगहनचरणोंकापालनकियाजाताहै।समाधियोगकालक्ष्यहै, ध्यानकरनेवालेऔरध्यानकेउद्देश्यकेबीचएकता, औरईश्वरकोआत्मसमर्पण, इसेप्राप्तकरनेकीकुंजीहै।पतंजलिनेंइसेईश्वरप्राणिधानकहाहै , जोक़ीपांचवाअवश्यपालनकरनेवालानियमहै, ईश्वरकीअसीमपूर्णताकेसमक्षहमारीसीमितआत्म-पहचानकाआत्मसमर्पण, जोकियोगकीशिक्षाओंकास्रोतहै।  यहआत्मसमर्पणपरमेश्वरकीपूर्णताकीस्वीकृतिहैऔरउससेप्रभावितहोनेकीहमारीइच्छा , जैसेजैसेहमयोगकेपथपरआगेबढ़तेहैं।  हमयोगकेआदिगुरुकेअनुग्रहसे   दैवीयआशीर्वाद, बुद्धिऔरअंततःमिलन, समाधिलेतेहैं। ईश्वरप्राणिधानकेविकासकेपहले, योगमेंप्रगतिस्वयंकेंद्रितहोतीहै।  हमसोचतेहैं, मैंअपनेप्रयासऔरविवेककेमाध्यमसेयोगिकप्रगतिकररहाहूं।ईश्वरप्राणिधानईश्वरपरनिर्भरताकेऐसेप्रयासकोबढ़ावादेताहैजिससेसमाधिनामकअंतिमअनुग्रहकीप्राप्तिहोतीहै। स्वामीहरिहरनन्दअरन्यापतंजलिकीसोचकी  व्याख्याकरतेहैं: भगवान्परमननकेमाध्यमसेएकमुक्तआत्मा, सामान्यअवस्थामेंभीमनशांतऔरउसकेद्वाराकेंद्रितहोजाताहै।इसतरहकीएकाग्रताकेमाध्यमसेप्राप्तज्ञानसे, एकयोगीकीआध्यात्मिकआवश्यकताओंकीपूर्तिहोतीहै। आइयेइसकीतुलनाएकस्कूलकीपरीक्षालेनेसेकरें।यदिआपबसअध्ययनकरतेऔरपरीक्षादेते  , तोआपकोबी + मिलेगा।हालांकि, ईमानदारीसेईश्वरकेआशीर्वादकीमांगकरतेहुए, आपबेहतरकरतेहैंऔरएअर्जितकरतेहैं।सभीजटिलक्षेत्रोंमें , कोईव्यक्तिअपनेआपसेइतनीहीदूरजासकताहै।वास्तवमेंकिसीभीक्षेत्रमेंमाहिरहोनेकेलिए , एकयोग्यशिक्षकयाकोचकीआवश्यकताहोतीहै।राजयोगकेलिएउसकेपूर्वपुरुषएवंप्रथमगुरुईश्वरसेबेहतरकौनसाशिक्षकहोगा ? ईश्वरकोअपनेशिक्षककेरूपमेंईश्वरप्राणिधानकेमाध्यमसेपायाजासकताहै। मेरेगुरूइसबातकाएकविवेकपूर्णविवरणदेतेहैं  किकैसेउन्नतध्यानकरनेवालाआत्मसमर्पणकाअभ्यासकरताहै ,  याफिरत्यागका ,  भगवान्  कीपूर्णअवस्थाशिऔरईश्वरकीसर्वव्यापीचेतनावा  काअनुभवकरतेहुए : व्यक्तिगतपहचानकोसँभालनेकीदोहरीस्थितिमें , वेकहतेहैं , शिवाकीइच्छापूर्णहोगी , जबकिउसकीनवीनऔरअतिपरिष्कृत  साधनाजोव्यक्तिगतभौतिकताकेआखिरीछोरकात्यागकरतीहैउसउत्तमसमयकाजोअनंतसंचितशक्तिऔरगैरशक्तिजोउसकेभीतरहै।यहवहअपनेआपकोएकमंत्रकेरूपमेंकहताहैजबवहबाहरीदुनियामेंदेखताऔरसुनताहै।लेकिनजबआंखेऔरकानबंदहोजातेहैं , उसकीइच्छाकीसंचारितशक्तिकेमाध्यमसे , वहवाऔरशिऔरशिऔरवाकीसमाधीमेंविलीनहोजाताहै , वास्तविकतामेंस्वयंकाअनुभवकरतेहुएऔरस्वयंमेंवास्तविकताकाअनुभवकरतेहुए। जैसाहमनेदिखायाहै, समर्पणतीनोंप्रमुखयोगमेंमौजूदहै: भक्ति, कर्मऔरराजसभीतीनविषयोंकीगहरीउपलब्धियोंकोमहसूसकरनेकेलिएइसकीप्रमुख  भूमिकाहै।यहशायदएकविडंबनाहैकिहमारेअमर  आत्मको  पानेकेलिएहमेंअपनेनिजीआत्मकात्यागकरनाचाहिए।


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