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    नृत्य और आध्यात्मिक मार्ग

    नृत्य और आध्यात्मिक मार्ग

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    जो ललित कलाओं में सफल हो सकता है उसका हमारे धार्मिक जीवन में प्रगति से सम्बन्ध हो सकता है क्या ?

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    द्वारा सतगुरु बोधिनाथा वेय्लान्स्वामी



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    मेरे गुरु , सिवाय सुब्रमुनियस्वामी के पास एक उपहार था कि वे अधिक आध्यात्मिक व्यक्ति बनने के लिए एक व्यवहारिक रास्ता एवं दिशा निर्देश प्रस्तुत कर सकते थे। हिन्दुइज़्म में उच्च दर्शन की बात करना आसान है : “ मनुष्य भगवान है। हम दिव्य हैं”, इत्यादि। ऐसी गहन बातें करना आसान है , “ आप वो जीव हैं जिसके भीतर असीम शक्ति है।” तथापि इन सिद्धांतों को व्यवहार में लाना और वो भी इस हद तक कि इस वर्ष हम और अधिक आध्यात्मिक व्यक्ति हैं , एक वर्ष पहले की तुलना में - यह एक चुनौती है और इस लेख में हम इसी की खोजबीन करेंगे।

    इसमें हमारी मदद करने की क्षमता गुरुदेव की प्रतिभा का हिस्सा है। वे हमें उच्च दर्शन के साथ ही व्यावहारिक दिशा निर्देश देते हैं और इस प्रक्रिया के दौरान हम अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं। उन्होंने कभी यह दृष्टिकोण नहीं लिया कि हममें कमज़ोरियां और नाकामियां हैं और इसलिए अपूर्ण हैं। वे इसके विपरीत बात करते हैं : हम दिव्य प्राणी हैं , जिसका अर्थ यह है कि हम आत्मा हैं और आध्यात्मिक प्राणी हैं। तथापि , हममें अन्य गुण भी हैं जो मानव होने के साथ होते हैं। हममें प्रवृत्तियां हैं , हमारे पास बुद्धि है , हमारे पास अहंकार है और हमें इन सब पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है जिससे की हमारी आत्मा , हमारा आध्यात्मिक स्वभाव , हमारे दिनों पर हावी हो। जैसा कि गुरुदेव कहते हैं , “शांति नियंत्रण है और नियंत्रण स्वतंत्रता है।”

    नृत्य और अनुशासन पर मेरे विचार मैंनें पहली बार साँझा किये थे सन 2003 में एक बातचीत के दौरान जो कि मैंने कैलिफोर्निया में की थी , एक अरंगेत्रम , युवा हिन्दू महिला के पहले सार्वजानिक नृत्य प्रदर्शन के अवसर पर। उसकी उपलब्धि नें मुझे प्रेरित किया कि में रुपरेखा प्रस्तुत करूँ उन पांच तरीकों के नज़रिये जो नृत्य सीखने में शामिल होते हैं और हिन्दू आध्यात्मिक पथ पर प्रगति करने में शामिल होते हैं और वास्तव में एक ही होते हैं। गुरुदेव की शैली का अनुसरण करते हुए मैनें इस विषय पर एक व्यावहारिक दृष्टिकोण लिया। बाद में दर्शन करने वाले सदस्य आगे आये यह अभिव्यक्त करने के लिए कि यह अंतर्दृष्टि उनकी अपनी आध्यात्मिक खोज पर कैसे लागु होतीं थी।

    गुरुदेव अपनी युवा अवस्था में एक निपुण नर्तक थे। वर्षों बाद , विशेष अवसरों पर वे भारतीय शास्त्रीय मणिपुरी शैली में नृत्य किया करते थे। और जब वे नृत्य के विषय में बात करते थे , वे नियमित रूप से टिपण्णी करते थे कि नृत्य सीखने के दौरान आप अपेक्षा करते हैं और दरअसल नृत्य गुरु को भुगतान करते हैं कि वो आपके कमज़ोर क्षेत्रों की तरफ इशारा करें , न कि आपकी तारीफ करने के लिए कि जो आप अच्छे से कर रहे हैं। हमारे सतगुरु के रूप में वे वही मार्गदर्शन हमें अपने आध्यात्मिक जीवन के सन्दर्भ में देते थे।

    गुरुदेव् की टिपण्णी हमें पूरी तरह से ले जाती थी हमारे आध्यात्मिक पथ की नृत्य के अध्धयन से तुलना करने में , जो कि हमारी शक्तियों और कमज़ोरियों के प्रति रुख तय करता है। क्या एक युवा महिला एक बेहतर नर्तकी हो सकती है उन हरकतों पर ध्यान केंद्रित करके जिन्हें वो अच्छी तरह से करती है ? निश्चित रूप से नहीं। उसे उन हरकतों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो वह अच्छी तरह नहीं कर पाती और उनको सुधरने के लिए प्रयास करना चाहिए। वो बेहतर नर्तकी बनती है अपनी मजबूतियों की तरफ न ध्यान दे के, बल्कि अपनी कमियों की तरफ ध्यान दे के।

    आध्यात्मिक पथ की तरफ देखते हुए , आइये हम उदहारण लेते हैं किसी का जो खुश होता है निकट के हिन्दू सेंटर की गतिविधियों का समन्वय करके। हालाँकि जब वो पूजा में शामिल होती है उसे देवता के लिए बहुत भक्ति महसूस नहीं होती। उसकी ताकत सेवा है और उसकी कमज़ोरी भक्ति है। और आगे बढ़ने के लिए उसको ज़रूरत है सेवा पर काम ध्यान केंद्रित करे और उन गतिविधियों पर अधिक जो उसकी भक्ति को गहरा करें, जैसे कि भजन गाना , मंदिर के लिए घर में उगे फूलों से मालाएं बनाना और देवता के लिए कपड़े सिलना।

    एक दूसरी तुलना सुधार की तरफ रवैया है। एक अच्छे नर्तक का रवैया होता है कि वो पहले किये नृत्य से कहीं बेहतर नृत्य कर सकती है। वो महसूस करती है कि सुधार की हमेशा गुंजाईश होती है और उसकी भाव भंगिमाएं हमेशा और अधिक परिष्कृत की जा सकती हैं।

    आध्यात्मिक पथ पर नज़र रखते हुए , आइये हम अहिंसा के सिद्धांत को उदहारण के रूप में लेते हैं। यह वास्तव में हिन्दूइज़्म का एक केन्द्रीय सिद्धांत है। बेशक , हम में से ज़्यादातर शारीरिक हिंसा में लिप्त नहीं होते। इसलिए, हम निष्कर्ष निकल सकते हैं कि अहिंसा हमारे लिए कोई चुनौती नहीं प्रस्तुत करता है।

    तथापि , आइये हम अहिंसा की परिभाषा को और समीप से देखते हैं , जिसके अनुसार दूसरों को विचारों, शब्द और करनी से नुक्सान नहीं पहुँचाना। इस स्पष्ट और सम्पूर्ण परिभाषा से इंगित होता है कि हालाँकि हम अपनी करनी द्वारा दूसरों को चाहे नुक्सान न पहुंचा रहे हों , हम अपने व्यव्हार को बेहतर बनाने का रवैया अपनाने का प्रयास कर सकते हैं , और भी अधिक अपनी भाषा को सावधानी पूर्वक देखते हुए और दूसरों को अपने शब्दों द्वारा नुकसान पहुँचाने से बचते हुए। मौखिक हिंसा के सर्वाधिक सामान्य रूप हैं चिढ़ाना , दूसरे को छोटा दिखाना , गपशप और पीठ पीछे निंदा करना। अपने शब्दों द्वारा दूसरों को नुक्सान पहुँचाने की हर कमी आध्यात्मिक प्रगति को पैदा करती है।

    आध्यात्मिक पथ और नृत्य के अध्ययन की तीसरी तुलना गलतियों की और हमारा रवैया है। कई नृत्य करने वाले शुरुआत में गलतियों के बारे में स्वयं सजग होते हैं। वे गलती करते हैं और घबरा जाते हैं और बाक़ी के नृत्य की कक्षा पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। एक अच्छा शिक्षक इंगित करता है कि ऐसी गलतियां स्वाभाविक हैं ; सभी नर्तक इन्हें करते हैं। शिक्षक के प्रोत्साहन से , वे गलतियों के डर पर काबू पा लेते हैं और एक अधिक परिपक्व दृष्टिकोण अपनाते हैं , वो यह कि एक मुश्किल हरकत के दौरान अगर गलत कदम पड़ता है, वे अगली बार बेहतर प्रदर्शन का प्रण करते हैं। हर गलती उनके शिल्प में सुधार करने के लिए एक अवसर बन जाती है।

    पूरी मानवता के लिए , कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन इस पथ पर कहाँ है , आध्यात्मिक प्रगति एक व्यक्ति के जीवन में की गयी गलतियों से सीखने से होती है। दुर्भाग्य से इस प्रक्रिया में अक्सर रूकावट इस गलत सोच वाले विचार से होती है कि हमें गलतियां करनी ही नहीं चाहियें। गलती करने के बाद सामान्यतया पहली प्रतिक्रिया होती है कि इसके बारे में परेशान और भावुक हो जाते हैं , या, अगर गंभीर गलती है , बोझ महसूस होता है , यहां तक कि उदासी छा जाती है। हमें होना चाहिए एक नर्तक की तरह और केवल यह प्रण करें कि अगली बार बेहतर करेंगे। इसी प्रकार एक दूसरी अच्छी प्रतिक्रिया होगी कि क्या हुआ और क्यों हुआ इसके बारे में स्पष्ट रूप से सोचें और वह तरीका ढूंढें जिससे भविष्य में ऐसी गलती दोबारा ना हो। शायद हम पूरी तरह से सावधान नहीं थे , तो हम प्रण करते हैं कि अगली बार अधिक विवेकपूर्ण होंगे जिससे समस्या दोबारा होने से रोक पाएंगे। शायद हमें कुछ पता नहीं था और अनुभव हमें नया ज्ञान देता है जिसका अगली बार इस्तेमाल होना चाहिए।

    एक चौथी तुलना यह है कि नृत्य , आध्यात्मिक साधना की तरह , इच्छाशक्ति, जागरूकता और जीवन शक्ति के अनुशासित नियंत्रण को मांगता है। नृत्य के दौरान इच्छाशक्ति का इस्तेमाल होता है शरीर को चुनौतीपूर्ण हरकत वाली स्थितियों से गुज़रने के लिए, जो संगीत और सुघढ़ता के तालमेल के साथ होता है। हमारी चेतना को बराबर गाने के मतलब पर केंद्रित रहना चाहिए और इसपर कि कैसे उस मतलब को हमारे चेहरे , हाथ और शरीर की भाषा द्वारा अभिव्यक्त किया जा रहा है। जीवन शक्ति को बराबर शरीर से गुज़ारना चाहिए एक नियंत्रित तरीके से। वास्तव में , नृत्य की मूल भाव भंगिमाओं को सिखाने में गुरुदेव ज़ोर देते थे कि पहले आप अपनी जीवन शक्ति, प्राण को हरकत में लाओ अपने मन के द्वारा और वह प्राण फिर बाज़ू या पैर को हरकत में लाते हैं।

    अनुशासित नियंत्रण के आध्यात्मिक पक्ष के लिए आइये हम ध्यान के अभ्यास को देखें। बिना कोई हरकत किये ध्यान में बैठने की क्षमता के द्वारा हमारी इच्छा शक्ति प्रकट होती है। हमें आवश्यकता है अपनी चेतना को बराबर ध्यान की वस्तु पर केंद्रित करने की , बिना अपने विचारों को अन्य क्षेत्रों में भटकने देने के। जीवन शक्ति का नियंत्रण होता है प्राणायाम की प्रक्रिया के द्वारा , श्वासों को नियंत्रित करने से और प्रत्याहार , हमारी ऊर्जा को बाहरी इन्द्रियों से वापिस ले कर अपने आध्यात्मिक केंद्र में लाने से।

    एक पांचवी तुलना यह है कि नृत्य और आध्यात्मिक प्रयास दोनों गैर बौद्धिक हैं। आप एक किताब को पढ़ने के द्वारा एक अच्छे नर्तक नहीं बन सकते। जबकि कुछ अध्ययन शामिल है , ध्यान तो नृत्य के वास्तविक अभ्यास पर है। हमारा भौतिक शरीर महत्वपूर्ण रूप से बदल जाता है और नई क्षमताएं प्राप्त करता है बहुत से वर्षों के निपुण नर्तक बनने के अभ्यास के द्वारा।

    दार्शनिक किताबें पढ़ना भी आध्यात्मिक पथ पर प्रगति करने का एक हिस्सा है। तथापि , सबसे महत्त्वपूर्ण है आध्यात्मिक अनुशासन का नियमित अभ्यास , जिसे साधना कहते हैं। हमारी भावनात्मक , बौद्धिक और आध्यात्मिक प्रकृति में वर्षों की साधना करने से महत्वपूर्ण बदलाव आते हैं। गुरुदेव के सतगुरु , जाफना, श्री लंका के शिवा योगस्वामी जब कुछ भक्तों को दर्शन पढ़ने पर बहुत अधिक समय व्यतीत करते देखते थे तो ज़ोर दे कर कहते थे , “ अरे मुर्ख , वह किताबों में नहीं है।” वह उनसे आग्रह करते थे कि वे बैठें , स्थिर हों , मन को नियंत्रित करें।

    नृत्य के अनुशासन अच्छी तरह से परिभाषित हैं , और इनमें शामिल हैं ताकत , लचीलापन , सुघड़ता और तकनीक। हिन्दूइज़्म के आध्यात्मिक अनुशासन भी मोटे तौर पे चार श्रेणियों में विभाजित किये जा सकते हैं : अच्छा आचरण , सेवा , भक्ति एवं ध्यान।

    अंत में , हमने पांच तरीकों पर गौर किया है जिनका नृत्य और आध्यात्मिक पथ पर प्रगति पर एक सा नज़रिया है। एक महत्वपूर्ण क्षेत्र जिससे सबका फायदा हो सकता है , वो है अपनी कमज़ोरियों को सुधारना। अपने जीवन में इसे लागु करें अपने अभ्यास का वह पहलु चुन कर जिसमें सुधार की आपको गुंजायश लगती हो। उदहारण के तौर पर , शायद कुछ दिन आप घर के मंदिर में घर छोड़ने से पहले पूजा करते हैं और अन्य दिन इसे छोड़ देते हैं। और अधिक अनुशासित होने का प्रण करें और हर रोज़ घर के मंदिर में समय बिताएं। एक बार आप इस अभ्यास में नियमित हों , आपने एक कमज़ोर क्षेत्र को मज़बूत कर लिया और ठोस आध्यात्मिक प्रगति की , जैसे कि , थोड़ा थोड़ा करके , एक महान नर्तक अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाता है।


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