हिंदूधर्ममेंआत्म-साक्षात्कार

Realization in Hinduism

कोईभीव्यक्तिआध्यात्मिकपथकीशुरुआतईश्वर-साक्षात्कारसेउसीप्रकारनहींकरसकता, जैसेवहगणितकीशिक्षाकाप्रारंभसीधेकलन-गणितसेनहींकरसकता।

सतगुरुबोधिनाथवेलान्स्वामी

हालहीमेंएकभक्तनेहमारेसाप्ताहिकआभासीसत्संगमेंदोप्रश्नपूछे।मैंनेजोउत्तरदिए, उनकेसाथकुछअतिरिक्तविचारभीयहाँप्रस्तुतकररहाहूँ।

पहलाप्रश्न

आजकेसमयमेंआत्मसाक्षात्कारकाअर्थप्रायःअपनेलक्ष्योंकीप्राप्तियामहत्वाकांक्षाओंकीपूर्तिसमझाजाताहै।इसकेआध्यात्मिकअर्थकोअधिकस्पष्टरूपसेव्यक्तकरनेकेलिएआपकौनसाशब्दसुझाएँगे?”

आपकायहकहनासहीहैकिआधुनिकलौकिकपरिवेशमेंआत्मसाक्षात्कारकीअवधारणाकाअर्थहिंदूचिंतनमेंप्रयुक्तअर्थसेभिन्नहोगयाहै।आजइसेप्रायःव्यक्तिकीअंतर्निहितक्षमताओंकेपूर्णविकासयाजीवनमेंसफलताप्राप्तकरनेकेरूपमेंसमझाजाताहै।व्यक्तित्वविकासकेक्षेत्रमेंयहशब्दलोगोंकोउनकीआकांक्षाओंकोवास्तविकतामेंपरिणतकरनेकेसंदर्भमेंप्रयुक्तहोताहै।

यहआधुनिकप्रयोगमुख्यतःमनोविज्ञान, विशेषकरअब्राहममैस्लोकेसिद्धांतोंसेप्रभावितहै, जिन्होंनेस्वपरिपूर्णताकोमानवविकासकीसर्वोच्चअवस्थामाना।समयकेसाथआत्मसाक्षात्कारशब्दकाप्रयोगलोकप्रियसाहित्यऔरप्रेरकलेखनमेंइसीअर्थमेंहोनेलगा।

किन्तुयोगऔरअध्यात्मकीपरंपरामेंआत्मसाक्षात्कारकाअर्थकहींअधिकगहनहै।इसकासंबंधबाहरीउपलब्धियोंसेनहीं, बल्किआंतरिकआध्यात्मिकसत्यकेप्रत्यक्षअनुभवसेहै।केवलकिसीसत्यकोबौद्धिकरूपसेसमझलेनासाक्षात्कारनहींहै; उससत्यकावास्तविकअनुभवकरनाहीसाक्षात्कारहै।उदाहरणकेलिए, आत्माकेस्वरूपकाअनुभवएकउज्ज्वलआंतरिकप्रकाश, अर्थात्आत्मज्योति, केरूपमेंकियाजासकताहै।यहजानलेनाकिआत्माकोइसप्रकारअनुभवकियाजासकताहै, साक्षात्कारनहींहै।वास्तवमेंउसआत्मज्योतिकाप्रत्यक्षदर्शनहीसाक्षात्कारहै।

आधुनिकअर्थोंसेउत्पन्नभ्रमसेबचनेकेलिएसंस्कृतशब्ददर्शनकाप्रयोगअधिकउपयुक्तहोसकताहै।सतगुरुशिवायसुब्रमुनियास्वामीनेअपनेलेखनमेंआध्यात्मिकअनुभूतिकेलिएदर्शनशब्दकाप्रयोगकियाहै।परमात्मदर्शनम्कासरलअर्थहैपरमात्माकाप्रत्यक्षआध्यात्मिकदर्शन।

दूसराप्रश्न

हिंदूधर्ममेंईश्वरसाक्षात्कारऔरआत्मसाक्षात्कारकाक्याअर्थहै?”

हिंदूधर्मकीविभिन्नदार्शनिकपरंपराओंमेंइनशब्दोंकेअर्थभिन्नभिन्नहैं।

भक्तिप्रधानपरंपराओंमेंआत्मसाक्षात्कारकाअर्थअपनीवास्तविकआत्मिकप्रकृतिकोशरीरसेभिन्नरूपमेंजाननाहै, जबकिईश्वरसाक्षात्कारकाअर्थपरमेश्वरकाप्रत्यक्षअनुभवकरनाहै।

अद्वैतपरंपराओंमेंआत्माकेगहनतमस्वरूपकोपरमसत्यकेसाथअभिन्नमानाजाताहै।इसलिएवहाँआत्मसाक्षात्कारऔरईश्वरसाक्षात्कारअंततःएकहीउपलब्धिकेदोनामहैं।

छांदोग्यउपनिषद्काप्रसिद्धमहावाक्यतत्त्वमसिइसीसत्यकीघोषणाकरताहै।इसकाअर्थहै—“तुमवहीहो।यहाँतुमव्यक्तिगतआत्माकाऔरवहपरमसत्ययाब्रह्मकाप्रतीकहै।यहआत्माऔरब्रह्मकीअभिन्नताकोव्यक्तकरताहै।

जबइसअद्वैतदृष्टिकोणकोकेवलइसीरूपमेंप्रस्तुतकियाजाताहै, तोयहसामान्यव्यक्तिकोअत्यंतदूरऔरअप्राप्यलक्ष्यजैसाप्रतीतहोसकताहै।मेरेगुरुशिवायसुब्रमुनियास्वामीनेइसकीअधिकव्यावहारिकव्याख्याकी।

उन्होंनेकहा

आत्मसाक्षात्कारअनेकचरणोंमेंविकसितहोताहै।स्वयंकोमन, बुद्धि, भावनाओंयाएकतुच्छव्यक्तिकेरूपमेंनहीं, बल्किजीवात्माकेरूपमेंअनुभवकरनासंतोषऔरसुरक्षाप्रदानकरताहै।यहीप्रारंभिकअवस्थाहै।

आत्माकोसत्चित्आनंदकेरूपमेंअनुभवकरनेसेगहनतृप्तिप्राप्तहोतीहै।बाहरीसंसारसेसंबंधितविचारऔरभावनाएँशांतहोजातीहैंतथासाधककासमूचाअस्तित्वदिव्यचेतनाकेप्रवाहकेप्रतिसंवेदनशीलहोउठताहै।

समय, रूपऔरस्थानसेपरेस्थितपरमशिवकासाक्षात्कारअत्यंततीव्रऔरविलक्षणअनुभवहै।यहसभीबंधनोंकोकाटदेताहैऔरचेतनाकीदिशाकोपरिवर्तितकरदेताहै।तबसाधकआत्माकेभीतरझाँकतानहीं, बल्किआत्माकीदृष्टिसेसमस्तअस्तित्वकोदेखताहै।

यहीअंतिमअवस्थाउपनिषदोंकेतत्त्वमसिकाप्रत्यक्षअनुभवहै।

आत्मसाक्षात्कारकेतीनचरण

गुरुदेवनेस्पष्टकियाकिआध्यात्मिकअनुभूतितीनक्रमिकअवस्थाओंमेंविकसितहोतीहै

  1. स्वयंकोजीवात्माकेरूपमेंजानना।
  2. सर्वव्यापकदिव्यचेतनासच्चिदानंदकाअनुभवकरना।
  3. समय, रूपऔरस्थानसेपरेस्थितपरमसत्य, परमशिव, कासाक्षात्कारकरना।

अद्वैतदर्शनमेंआध्यात्मिकउन्नतिकोसमझनेकेलिएयहत्रिस्तरीयसंरचनाअत्यंतउपयोगीहै।

गणितसेतुलना

आत्मसाक्षात्कारकीप्रक्रियाकोसमझनेकेलिएगणितकाउदाहरणउपयोगीहै।

गणितकाअध्ययनसामान्यतःसरलसेजटिलस्तरोंकीओरक्रमशःबढ़ताहै

पहलास्तरगिनती, मूलअंकगणित, भिन्नऔरदशमलव।

दूसरास्तरबीजगणित, रेखागणितऔरत्रिकोणमिति।

तीसरास्तरकलनगणित, सांख्यिकीऔरप्रायिकता।

कोईभीविद्यार्थीमूलअंकगणितऔरबीजगणितसीखेबिनासीधेकलनगणितकाअध्ययनप्रारंभनहींकरता।उसीप्रकारआत्मसाक्षात्कारभीक्रमिकरूपसेविकसितहोताहै।

स्वयंकोजीवात्माकेरूपमेंअनुभवकरनाप्रारंभिकगणितकेसमानहै।

सच्चिदानंदकाअनुभवमध्यवर्तीस्तरोंबीजगणितऔररेखागणितकेसमानहै।

परमशिवकासाक्षात्कार, जोसभीगुणोंऔरसीमाओंसेपरेहै, गणितकेसर्वोच्चस्तरकेसमानहै।

मैंकौनहूँ?

परमगुरुयोगस्वामीनेअपनेपत्रोंमेंजीवात्माकेरूपमेंस्वयंकोअनुभवकरनेकामार्गबतायाहै

तुमशरीरनहींहो।तुममननहींहो।तुमबुद्धिनहींहो।तुमइच्छाशक्तिभीनहींहो।तुमआत्माहो।आत्माशाश्वतहै।महानआत्माओंनेअपनेप्रत्यक्षअनुभवसेइसीनिष्कर्षकोप्राप्तकियाहै।इससत्यकोअपनेमनमेंगहराईसेस्थापितकरो।

किन्तुएकबातकासदैवध्यानरखोधर्मकेमार्गसेकभीविचलितमतहोना।प्रत्येकजीवमेंईश्वरकीपवित्रउपस्थितिकादर्शनकरो।वहभीतरभीहैऔरबाहरभी।मैंसदैवकहताहूँ—‘मैंवहीहूँ।’”

शरीर, मन, बुद्धिऔरइच्छाशक्तिसेअपनीपहचानहटानेकेलिएकिसीउच्चतरसत्तासेपहचानस्थापितकरनीहोतीहै।वहसत्ताहैसाक्षी।

साक्षीवहअपरिवर्तनीयऔरस्वयंप्रकाशितचेतनाहै, जोशरीर, मनऔरअनुभवकीसभीअवस्थाओंकोदेखतीरहतीहै।

स्वामीहर्षानंदकेअनुसार, वेदांतमेंजीवात्माकोसाक्षीयासाक्षीचैतन्यकहाजाताहैक्योंकिवहचेतनाकीतीनोंअवस्थाओंजाग्रत, स्वप्नऔरसुषुप्तिकासाक्षीहोताहै।

मेरेगुरुनेसाक्षीकोमनऔरउसकीगतिविधियोंसेपृथकखड़ीजागरूकचेतनाकेरूपमेंवर्णितकिया।उन्होंनेकहाकिसाधनाकाउद्देश्यऐसीएकाग्रताविकसितकरनाहै, जिससेसाधकअपनीचेतनाकोजहाँचाहे, जबचाहेऔरजितनीदेरचाहेवहाँस्थिररखसके।

इसअभ्यासमेंचेतनाकोविचारों, भावनाओंऔरशारीरिकप्रक्रियाओंसेअलगकरकेवलजागरूकहोनेकीजागरूकतामेंस्थापितकियाजाताहै।

जैसेजैसेयहसाधनागहरातीहै, चेतनाअधिकसूक्ष्मऔरपरिष्कृतहोतीजातीहै।साधकजीवात्माकेप्रारंभिकअनुभवसेआगेबढ़करसर्वव्यापकदिव्यचेतनासच्चिदानंदकाअनुभवकरनेलगताहै।

जोलोगसच्चिदानंदकाअनुभवकरतेहैं, उनकेहृदयमेंसमस्तप्राणियोंकेप्रतिसार्वभौमिकप्रेमहोताहै।उनकेलिएजीवनआनंदमयऔरमंगलमयअनुभवबनजाताहै।वेसंसारकोउसीरूपमेंस्वीकारकरतेहैंजैसावहहैऔरसमझतेहैंकिमानवताअपनेहीकर्मोंकेपरिणामोंसेगुजररहीहै।

फिरभीअनुभूतिकातीसराऔरअंतिमचरणपरमसत्य, परमशिवकासाक्षात्कारअभीशेषरहताहै, जोअधिकांशसाधकोंकेलिएभविष्यमेंप्राप्तहोनेवालालक्ष्यहै।

यहीआत्मसाक्षात्कारकीयात्राकीचरमपरिणतिहै।

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